बेकार हो गये मल्लाहों के जालनहीं बन सका फिश हब, मछली के लिये लोग पूरी तरह आंध्रा पर आश्रितप्रतिनिधि, मोरवा तमाम प्रयासों के बाबजूद मोरवा प्रखंड में फिश हब बनने का सपना अधूरा है. मल्लाहों के हजारों हाथ बेकार हो गये है. वहीं घर में टंगा जाल अपनी दुर्दशा की कहानी खुद बयां कर रही है. क्षेत्र में जलाशयों की कोई कमी नहीं है. नून नदी के 35 किलोमीटर का विशाल दायरा है तो सनहत, खनुआं, खमइठ झाल जैसे मछली पालन करने योग्य अफरात भूमि. मछली पालन की अपार संभावनाएं है. दरबा, सारंगपुर, मरीचा, हरपुर भिण्डी जैसे पंचायतों के हजारों हाथ अपनी रोजी रोटी गंवा चुके हैं. कुछ दिनों पहले तक मछली पालन करना इनके आजीविका का साधन हुआ करता है आज रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं. मल्लाहों के जाल अब शोभा की वस्तु बनी हुई है. आंकड़ों के मुताबिक प्रखंड क्षेत्र में करीब डेढ़ सौ क्विंटल मछली की रोजाना खपत है. इसमें से 90 फीसदी मछलियां आंध्रा जैसे प्रदेशों से मंगायी जाती है. पोखरे एवं नदी से बहुत कम मात्रा में मछली का उत्पादन होता है. लोग बताते हैं कि जल जमाव न होना यहां की बड़ी समस्या है. नून नदी इतना छिछला है कि यहां पानी रूक ही नहीं पाता है. अन्य जलाशयों का भी यही हाल है. बरसात के दिनों में तो एक दो माह तक पानी थमता है लेकिन बारिश खत्म हेाते ही पानी सूख जाता है. कई बार लोगों ने मछली पालन का मन भी बनाया लेकिन इसके लिये उचित संरक्षण नहीं मिलने के कारण इसे छोड़ दिया.
पूरा न हुआ मोरवा का फिश हब बनने का सपना
बेकार हो गये मल्लाहों के जालनहीं बन सका फिश हब, मछली के लिये लोग पूरी तरह आंध्रा पर आश्रितप्रतिनिधि, मोरवा तमाम प्रयासों के बाबजूद मोरवा प्रखंड में फिश हब बनने का सपना अधूरा है. मल्लाहों के हजारों हाथ बेकार हो गये है. वहीं घर में टंगा जाल अपनी दुर्दशा की कहानी खुद बयां कर रही […]
