सैकड़ों एकड़ में लगी फसल बरबाद

सैकड़ों एकड़ में लगी फसल बरबाद हाहाकार : पहले प्राकृतिक आपदा और अब सैनिक कीटों की मार समस्तीपुर : जिले के किसानों में लहलहाती फसलों के बरबाद होने से हाहाकार मचा हुआ है. सैनिक कीटों के प्रभाव से इनकी फसल इतनी प्रभावित हो रही है कि किसानों को पूंजी डूबती नजर आ रही है. पहले […]

सैकड़ों एकड़ में लगी फसल बरबाद
हाहाकार : पहले प्राकृतिक आपदा और अब सैनिक कीटों की मार
समस्तीपुर : जिले के किसानों में लहलहाती फसलों के बरबाद होने से हाहाकार मचा हुआ है. सैनिक कीटों के प्रभाव से इनकी फसल इतनी प्रभावित हो रही है कि किसानों को पूंजी डूबती नजर आ रही है. पहले प्राकृतिक विपदा और अब कीटों का प्रभाव. किसान समझ नहीं पा रहे हैं कि इससे कैसे फसल को बचाया जाये.
हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए प्रभावित खेतों का निरीक्षण करना शुरू कर दिया है और किसानों को इससे बचाव के उपाय बताये जा रहे हैं.
मोरवा प्रखंड के सैकड़ों एकड़ में लगी मक्के एवं अन्य फसलों पर सैनिक कीट का अचानक प्रकोप हो गया है. देखते ही देखते कीट सारे पत्ते को चट कर जाते हैं और इन कीटों का सीधा असर फसल के उपज पर भी पड़ता है. प्रखंड कृषि पदाधिकारी लोकनाथ ठाकुर के अनुसार यह फसलों के लिए महामारी है. अगर समय रहते इस पर काबू नहीं पाया गया तो फसलों पर इसका ज्यादा दुस्प्रभाव पड़ेगा. इसी क्रम में जिला से प्राप्त निर्देशों के अनुसार टीम बनाकर फसलों की क्षति का जायजा लेने के लिए विभिन्न पंचायतों में कृषि सलाहकार एवं विशेषज्ञों को लगाया गया है.
खेतों का किया निरीक्षण
बुधवार को गुनाई बसही पंचायत के शंभू पासवान, संजय सहनी, हरदेव मंडल, लक्षमी सहनी आदि किसानों के खेतों का निरीक्षण किया गया. जिसमें सैनिक कीट के प्रकोप को साफ साफ देखा गया. इन किसानों को इसके बचाव के लिए उपाय बताये गये. जिसके तहत क्लोरोपायरीफॉस, प्रोफेनोफॉस, साइपरमेथ्रीन जैसे दवाओं का उपयोग करने की सलाह किसानों को दी गई.
किसानों के अनुसार विगत सालों में इस तरह का प्रभाव खेतों पर देखा गया है लेकिन किसानों को इससे बचाव का न कोई तरीका पता था और न ही विभाग द्वारा कोई निर्देश दिये गये थे.फसलों की दुर्गति देख किसानों की सारी प्लानिंग चौपट हो रही है. उनकी पूंजी के साथ साथ सारा मेहनत बेकार साबित हो रहा है. फसल निरीक्षण के मौके पर सभी किसान सलाहकार एवं कृषि समन्यक के अलावे अन्य किसान और ग्रामीण मौजूद थे.
किसान ऐसे बचाएं अपनी फसल
हाल ही में आर्मी वर्म का प्रकोप सूबे के किसानों के खेतों में देखा गया है. इन कीड़ों का रोकथाम बहुत आसान है. यदि सभी किसान इक्ट्ठा होकर कुछ अलग तरीकों को अपनायेंगें तो इन समस्याओं का निदान किया जा सकता है. इन समस्याओं का निदान करने के लिए सबसे पहले आर्मी वर्म का जीवन चक्र के बारे में हासिल करके प्रत्येक दशा में अलग-अलग तरीके अपनाकर आर्मी वर्म को नियंत्रित कर सकते हैं. कृषि वैज्ञानिकों की माने तो आर्मी वर्म का जीवन चक्र की चार दशाएं होती हैं. इसमें पतंगा,लाईट ट्रैप, फेरोमैन ट्रैप और पिल्लू अंडे के लार्वा से जन्म लेती है. जो आगे बढ़कर पर्वितित हो जाते हैं. ये सैनिकों की तरह सैकड़ों-हजारों की संख्या में फसल पर हमला बोलते हैं. अत: इन्हें सैनिक कीड़ा या आर्मी वर्म कहा जाता है.
कीटों के लिए वातावरण अनुकूल
शुरूआती दौर में छोटे-छोटे पिल्लू कोमल और कमजोर होते हैं तथा इसे मारना आसान होता है. इनका जीवन काल ग्रीष्म ऋतु में 13-14 तथा सर्दी में इनका जीवन काल 85-100 दिनों तक का होता है. इस समय वातावरण इनके अनुकूल होती हैं. अपने जीवन काल में ये कीड़े चार बार अपने त्वचा (केंचूल) बदलकर मोटे और शक्तियुक्त होते हैं तथा इन्ही अवस्था में फसलों को अधिक हानि पहुंचाती है.
इस अवस्था में इन कीड़ों को मार पाना बहुत की कठिन होता है. इन कीड़ों का एक खास स्वभाव है कि जैसे ही सूर्य का प्रकाश दिखाई देता है और गर्मी बढ़ती है, ये जमीन के अंदर छिप जाती हैं, तथा शाम होते ही जैसे ही गर्मी कम होता है ये कीड़े सक्रिय हो जाते है तथा हजारों की संख्या में निकल कर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं.
फलस्वरूप रातों-रात सारे फसल को चट कर जाते हैं. पिल्लू को मारने के लिए कोई जहरीली कीटनाशक (क्लोरोपाइरीफॉस 50 प्रतिशत तथा साइपर मेथीन 5 प्रतिशत ई़ सी़ प्रति लीटर पानी में 2 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी या प्रोफेनोफॉस 40 प्रतिशत तथा साइपरमेथ्रीन 4 प्रतिशत ई़ सी़ दवा का 2 मिली़ प्रति लीटर) का प्रयोग कर सकते हैं अथवा अन्य वानस्पतिक कीटनाशियों का भी प्रयोग कर सकते हैं.

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