उपेक्षा और आधुनिकता की मार से दम तोड़ रहे पारंपरिक जल स्रोत, भूजल संरक्षण पर बढ़ा खतरा
राजेश कुमार सिंह, पतरघटकभी गांवों की पहचान, शुद्ध पेयजल का सबसे भरोसेमंद स्रोत और सामाजिक जीवन का केंद्र रहे कुएं आज उपेक्षा के शिकार होकर अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. बदलती जीवनशैली, जल संरक्षण के प्रति घटती संवेदनशीलता तथा सरकारी योजनाओं की खानापूर्ति के बीच पारंपरिक जल स्रोत तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं. इसका असर केवल सांस्कृतिक विरासत पर ही नहीं, बल्कि भूजल संरक्षण पर भी पड़ रहा है. एक समय था जब गांवों में घर-घर कुएं हुआ करते थे. पीने, खाना बनाने और दैनिक उपयोग का अधिकांश पानी इन्हीं कुओं से प्राप्त होता था. कुएं का पानी शुद्ध, मीठा और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता था. यही कारण था कि कुएं केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि गांव की प्रतिष्ठा और सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा भी थे.
अनदेखी के कारण मिटता जा रहा अस्तित्व
हैंडपंप, मोटर, नलकूप और नल-जल योजनाओं के विस्तार के बाद पारंपरिक जल स्रोतों की उपयोगिता धीरे-धीरे कम होती गई. रखरखाव के अभाव में अधिकांश कुएं सूख गए हैं, जबकि कई तालाब भी उपयोगहीन हो चुके हैं. कई जगहों पर लोगों ने पुराने कुओं को मिट्टी से भरकर उन पर मकान तक बना लिए हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि कई पंचायतों में कुओं के जीर्णोद्धार के नाम पर केवल रंग-रोगन कर सरकारी राशि की निकासी कर ली गयी, जबकि वास्तविक मरम्मत नहीं कराई गई. परिणामस्वरूप अधिकांश कुएं आज भी जर्जर और उपेक्षित अवस्था में पड़े हैं.
भूजल संरक्षण के लिए गंभीर चेतावनी
पर्यावरणविदों का मानना है कि तालाबों और कुओं का खत्म होना भूमिगत जल संरक्षण के लिए गंभीर खतरे का संकेत है. पारंपरिक जल स्रोत वर्षा जल के प्राकृतिक संचयन और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यदि इन्हें बचाने की दिशा में ठोस पहल नहीं की गयी, तो आने वाली पीढ़ियां इन धरोहरों को केवल पुस्तकों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी. पुराने समय में राजा-महाराजा और समाज के प्रतिष्ठित लोग कुएं एवं पोखर खुदवाना पुण्य और प्रतिष्ठा का कार्य मानते थे. वेदों और पुराणों में भी जल स्रोतों के संरक्षण का महत्व वर्णित है. यही कारण है कि कुएं धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था के केंद्र भी रहे हैं.
कुएं से जुड़ी थीं सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं
ग्रामीण जीवन में कुएं का विशेष सामाजिक महत्व था. नवविवाहिताओं के गृह प्रवेश, नवजात शिशु के जन्म तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर कुआं पूजन की परंपरा निभाई जाती थी. विवाह की कई रस्में भी कुएं के आसपास संपन्न होती थीं. बुजुर्ग बताते हैं कि कुएं का पानी गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में अपेक्षाकृत गर्म रहता था. गांव की महिलाएं समूह में कुएं पर जुटकर लोकगीत गाते हुए पानी भरती थीं, जिससे सामाजिक मेलजोल और आपसी संबंध मजबूत होते थे. आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव से यह सांस्कृतिक परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है.
जीर्णोद्धार और संरक्षण की उठी मांग
स्थानीय ग्रामीणों ने सरकार से सभी पुराने और जर्जर कुओं का अविलंब जीर्णोद्धार कराने तथा उन्हें आधुनिक पेयजल योजनाओं से जोड़ने की मांग की है. उनका कहना है कि इससे कम लागत में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जा सकेगा और प्राचीन जल धरोहरों का संरक्षण भी संभव होगा. ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि कई पंचायतों में नल-जल योजना का समुचित लाभ लोगों तक नहीं पहुंच रहा है. विभागीय अधिकारियों और संवेदकों की मिलीभगत के कारण अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रही हैं. ऐसे में आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को स्वच्छ पेयजल के लिए परेशानी झेलनी पड़ रही है.
