सहरसा: आरण गांव बना राष्ट्रीय पक्षी मोरों का अनूठा बसेरा, सीएम के आश्वासन के 10 साल बाद भी संरक्षण की नीति का इंतजार

सहरसा के आरण गांव में राष्ट्रीय पक्षी मोरों का एक अनूठा बसेरा बन गया है, जहां मोर जंगल, खेत और घरों में बेखौफ विचरण करते हैं. तीन दशक पहले शुरू हुआ यह सफर आज भी जारी है, लेकिन सरकारी संरक्षण का अब भी इंतजार है.

सहरसा से चार किलोमीटर दूर आरण गांव मोरों का घर बन गया है. यह गांव राष्ट्रीय पक्षी मोर के लिए एक सुरक्षित और प्राकृतिक बसेरा है. गांव के जंगलों, खेत-खलिहानों और घर-आंगनों में बड़ी संख्या में मोर आज़ादी से घूमते दिखते हैं. फसल को नुकसान पहुंचने के बावजूद ग्रामीण इन मोरों को अपने परिवार का सदस्य मानते हैं और उनकी रक्षा करते हैं, जैसे वे अपने घर के सदस्य हों. हालांकि, मोरों की इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद सरकार और वन विभाग की ओर से इनके संरक्षण के लिए अब तक कोई खास योजना नहीं बनाई गई है, जिससे ग्रामीणों में निराशा है.

एक जोड़ी मोर से शुरू हुई एक अद्भुत यात्रा: कैसे आरण गांव बना मोरों का आशियाना

आरण गांव में मोरों के इस अनूठे बसेरे की कहानी तीन दशक पुरानी है. वर्ष 1991 में गांव के स्व. कारी झा उर्फ अभिनंदन यादव पंजाब से एक जोड़ी मोर लेकर आए थे. जब कारी झा 1991 में एक जोड़ी मोर लेकर आए, तो उन्होंने अपने आंगन में उनके लिए खास झोपड़ी बनाई. मोरनी के छह अंडे देने पर, कारी झा ने दिन-रात जागकर कुत्तों और बिल्लियों से उनकी हिफाजत की, जैसे वे उनके अपने बच्चे हों. धीरे-धीरे यह कुनबा बढ़ता गया और एक समय इनकी संख्या करीब पांच सौ तक पहुंच गई. वर्ष 2025 में कारी झा का निधन हो गया, लेकिन आज भी उनके घर-आंगन और गांव के हर कोने में मोर मंडराते नजर आते हैं.

लोगों के घर पर विचरण करते मयूर | Prabhat Khabar Network

###मुख्यमंत्री के वादे के आठ साल बाद भी मयूर अभयारण्य का इंतजार

वर्ष 2016 में 'निश्चय यात्रा' के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 16 दिसंबर को मधेपुरा से सहरसा आने के क्रम में आरण गांव पहुंचे थे. मुख्यमंत्री ने खुद आरण चौक पर बैठकर मोरों पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म देखी थी और ग्रामीणों की कहानी सुनी थी. उस समय उन्होंने गांव को 'मयूर अभयारण्य' के रूप में विकसित करने का आश्वासन दिया था. उन्होंने तत्कालीन जिलाधिकारी को प्रस्ताव तैयार कर भेजने और वन विभाग को सुरक्षा के लिए पेड़ लगाने का निर्देश दिया था. ग्रामीणों का कहना है कि, 'इस आश्वासन से हमें बड़ी उम्मीद जगी थी, लेकिन लगभग दस वर्ष बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है.'

गांव की चौहद्दी से बाहर नहीं जाते मोर, बहेलियों से रक्षा करते हैं ग्रामीण

करीब सात-आठ सौ घरों की बस्ती और आसपास के जंगलों को ही मोरों ने अपना सुरक्षित ठिकाना बना रखा है. ग्रामीणों के अनुसार, ये मोर गांव की चौहद्दी से बाहर जाना बिल्कुल पसंद नहीं करते. कई बार बाहर के लोग मोर के बच्चे ले गए, लेकिन वे जीवित नहीं रह सके, इसलिए अब ग्रामीण किसी को मोर का बच्चा नहीं देते. किसान कृष्ण कुमार कुंदन बताते हैं कि कई बार बहेलिए (शिकारी) मोर पकड़ने के इरादे से गांव पहुंचे, लेकिन ग्रामीणों ने उन्हें खदेड़ दिया. वर्षों साथ रहते हुए ग्रामीण अब मोरों के प्रजनन और जीवनचक्र (फरवरी-मार्च में नए पंख आना, अप्रैल-मई में प्रजनन और फिर बच्चों की परवरिश) से पूरी तरह परिचित हो चुके हैं और उनके बच्चों की सुरक्षा में खुद भी सहयोग करते हैं.

लोगों के घर पर विचरण करते मयूर | Prabhat Khabar Network

संरक्षण के साथ पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो आरण

ग्रामीण कृष्ण कुमार कुंदन और अमित कुमार का कहना है कि आरण में मोरों का प्राकृतिक बसेरा तैयार हो चुका है. 'वन विभाग के अधिकारियों को भी इसकी जानकारी है, लेकिन संरक्षण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है.' ग्रामीणों की मांग है कि वन विभाग अब मोरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले. चूंकि बड़ी संख्या में लोग मोरों को देखने आरण पहुंचते हैं, इसलिए यदि पर्यटन विभाग पहल करे, तो इस गांव को एक बेहतरीन 'मयूर पर्यटन केंद्र' के रूप में विकसित किया जा सकता है.


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लेखक के बारे में

By लालबहादुर कुमार

पत्रकारिता में 14 वर्षों का अनुभव. प्रिंट मिडिया में वर्ष 2012 से लगातार कार्यरत हैं. वर्तमान में मैं सहरसा जिले के सत्तरकटैया प्रखंड में समाचार संकलन के कार्य में जुटे हैं.उनकी रूचि शिक्षा एवं समाज सेवा है.

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