ज्ञान भारतम मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर डीएम की अध्यक्षता में हुआ विचार विमर्श प्रभावी क्रियान्वयन के लिए डीडीसी को बनाया गया नोडल पदाधिकारी सहरसा . जिलाधिकारी दीपेश कुमार की अध्यक्षता में गुरुवार संध्या पांडुलिपियों के संरक्षण, डिजीटिलाइजेशन निमित संचालित ज्ञान भारतम मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर अपेक्षित कार्यों के संबंध में विचार-विमर्श किया गया. इस संदर्भ में भारत सरकार द्वारा भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा एवं बौद्धिक विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए वर्ष 2025-26 के बजट में फ्लैगशिप पहल के रूप में ज्ञान भारतम मिशन की घोषणा की गयी है. इस मिशन के तहत देश भर में उपलब्ध भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित पांडुलिपियों का वैज्ञानिक संरक्षण, डिजिटलीकरण व अभिलेखीकरण किया जा रहा है. जिससे यह अमूल्य धरोहर शोधार्थियों, विद्यार्थियों व आम नागरिकों को सुलभ हो सके. ज्ञान भारतम मिशन के तहत राज्य के विभिन्न सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थानों, मठों, मंदिरों, शैक्षणिक संस्थानों, निजी एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों व व्यक्तियों के पास उपलब्ध कागज, भोजपत्र, ताड़पत्र, कपड़े में हस्तलिखित पांडुलिपियों की पहचान, सर्वेक्षण, कैटलॉगिंग, संरक्षण एवं डिजिटीलीकरण का कार्य किया जाना है. इसके सफल, सुचारु क्रियान्वयन निमित जिला स्तर पर एक अभियान के माध्यम से पांडुलिपियों का संग्रहण करने वाली संस्थाओं व व्यक्तियों को चिह्नित किया जाना है एवं तत्संबंधी सूची तैयार किया जाना है. इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए उप विकास आयुक्त को नोडल पदाधिकारी के रूप में नामित किया गया है. कमेटी में सदस्य के रूप में जिला शिक्षा पदाधिकारी, जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी, जिला पंचायत राज पदाधिकारी, अनुमंडल पदाधिकारी, प्रभारी पदाधिकारी सामान्य शाखा के साथ जिला से संबंधित विद्वान भी परामर्शी के रूप में सम्मिलित होंगे. 75 वर्षों से पुराने पांडुलिपि धारक से जनहित में अनुरोध किया कि वे इस संबंध में जिला जनसंपर्क कार्यालय को कार्यालय अवधि में सूचना दे सकते हैं. बैठक में अपर समाहर्ता निशांत, विशेष कार्य पदाधिकारी राजू कुमार, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी आलोक कुमार, जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी स्नेहा कुमारी एवं संबंधित क्षेत्र के गणमान्य रणविजय झा, मुक्तेश्वर प्रसाद, पंडित ताराकांत झा, डॉ नंद किशोर चौधरी, कुंदन कुमार मिश्रा, मुख्तार आलम, मोहनजी खान, शैलेन्द्र कुमार मिश्रा सहित अन्य संबंधित मौजूद थे.
75 वर्षों से पुराने पांडुलिपियों का होगा वैज्ञानिक संरक्षण व डिजीटलीकरण
75 वर्षों से पुराने पांडुलिपियों का होगा वैज्ञानिक संरक्षण व डिजीटलीकरण
