कोसी से गायब हो रहीं खैरही, मडुआ और कुरथी, क्या खत्म हो रही है हमारी पारंपरिक खेती की पहचान?

Kosi Agriculture: कोसी क्षेत्र अपनी समृद्ध पारंपरिक खेती और जैव विविधता को खोता जा रहा है। बाजारवाद और हाइब्रिड बीजों के बढ़ते उपयोग से देसी फसलें और जीव-जंतु लुप्त हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में मोटे अनाज की अहमियत फिर बढ़ रही है।

Kosi Agriculture: कोसी क्षेत्र, जो कभी पारंपरिक खेती और समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता था, आज तेजी से बदलती कृषि व्यवस्था के कारण अपनी पहचान खोता नजर आ रहा है. बाजारवाद, रासायनिक खेती और हाइब्रिड बीजों के बढ़ते इस्तेमाल ने खैरही, कौनी, मडुआ, कुरथी, तीसी और देसी धान की कई किस्मों को खेतों से लगभग गायब कर दिया है. इसके साथ ही देसी मछलियों, पक्षियों और अन्य जीवों की संख्या में भी लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है.

कोसी की पहचान थीं देसी फसलें, अब सिर्फ यादों में बची हैं

पतरघट समेत पूरे कोसी क्षेत्र में कभी खैरही, कौनी, जौ, बाजरा, तीसी, कुरथी, मडुआ, तुलबुली, देसी मकई और देसी अरहर की खेती बड़े पैमाने पर होती थी. धान की देशरिया, रानी शुक्ला, पैरवा, पैख और चननचूर जैसी किस्में किसानों की पहचान मानी जाती थीं. इन फसलों में प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और अन्य पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते थे. यही कारण था कि इन्हें स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद लाभकारी माना जाता था.

हाइब्रिड खेती ने बदल दी कृषि की तस्वीर

विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक उत्पादन और त्वरित आर्थिक लाभ की चाह में किसानों का रुझान तेजी से हाइब्रिड धान, गेहूं और मक्का की ओर बढ़ा. इससे पारंपरिक बीजों का संरक्षण नहीं हो सका और धीरे-धीरे उनकी खेती लगभग समाप्त होती चली गई. बहुफसलीय खेती की जगह एकल फसल प्रणाली ने ले ली, जिससे मिट्टी की उर्वरता और कृषि विविधता दोनों प्रभावित हुई हैं.

सिर्फ फसलें नहीं, जैव विविधता भी संकट में

खेती के बदलते स्वरूप का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा. कोसी नदी और उसकी सहायक धाराओं में मिलने वाली पोठिया समेत कई देसी मछलियां अब दुर्लभ हो गई हैं. वहीं गौरैया, गिद्ध, चील, कौवे, तितलियां और कई उपयोगी कीट-पतंगों की संख्या भी लगातार घट रही है. पर्यावरण विशेषज्ञ इसके लिए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग, प्राकृतिक आवासों के खत्म होने और एकल फसल प्रणाली को जिम्मेदार मानते हैं.

Kosi Agriculture: जलवायु परिवर्तन के दौर में फिर बढ़ रही मोटे अनाज की अहमियत

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में मोटे अनाज और देसी फसलें भविष्य की टिकाऊ खेती का आधार बन सकती हैं. ये फसलें कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं और बाढ़ तथा सूखे जैसी परिस्थितियों का बेहतर सामना करने में सक्षम होती हैं. यही वजह है कि देश और दुनिया में मिलेट्स यानी मोटे अनाजों को फिर से बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है.

बीज संरक्षण और किसानों को प्रोत्साहन की मांग

स्थानीय किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कृषि विभाग से देसी बीज बैंक की स्थापना, पारंपरिक फसलों के संरक्षण, किसानों को प्रोत्साहन राशि और इनके विपणन की बेहतर व्यवस्था करने की मांग की है. उनका कहना है कि यदि अभी प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां इन फसलों और जैव विविधता को केवल किताबों में ही देख पाएंगी.

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Author: Rajesh kr singh

Published by: Pratyush Prashant

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