देश की आजादी का इतिहास केवल दिल्ली, मुंबई या पटना जैसे बड़े शहरों की घटनाओं तक ही सीमित नहीं है. बिहार में सहरसा की धरती भी स्वाधीनता संग्राम के उन वीर सपूतों की शहादत की गवाह है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की बंदूकों के सामने घुटने टेकने के बजाय अपने सीने पर गोलियां खाना स्वीकार किया. महात्मा गांधी के आह्वान पर शुरू हुए 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान 29 अगस्त 1942 को सहरसा में जो रक्तरंजित संघर्ष हुआ, उसमें जिले के छह अमर शहीदों ने सर्वोच्च बलिदान देकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम हमेशा के लिए स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा लिया.
खजाने पर कब्जा और रेलवे स्टेशन पर अंग्रेजों से सीधी टक्कर
अगस्त 1942 में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ स्थानीय क्रांतिकारियों का आंदोलन अपने चरम पर था:
- सरकारी खजाने पर कब्जा: सहरसा में अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती देते हुए आंदोलनकारियों ने सरकारी खजाने पर अपना कब्जा जमा लिया था.
- ब्रिटिश सेना का आगमन: स्थिति को नियंत्रण में लेने और अपना शासन फिर से थोपने के लिए अंग्रेजों ने हथियारों से लैस एक सैन्य दस्ता सहरसा भेजा.
- पारंपरिक हथियारों से किया सामना: अंग्रेजी सेना के सहरसा रेलवे स्टेशन पहुंचने की खबर मिलते ही युवा क्रांतिकारी वहां जुट गए. बिना किसी आधुनिक हथियार के, मात्र लाठी, भाला और ढेलौरी जैसे पारंपरिक हथियारों के सहारे उन्होंने अंग्रेजी फौज का डटकर सामना किया.
पीठ नहीं, सीने पर खाईं गोलियां: 6 वीरों की अमर शहादत
आंदोलनकारियों को खदेड़ने के लिए अंग्रेजी सेना ने अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दीं, लेकिन आजादी के मतवालों के कदम पीछे नहीं हटे. इस भीषण संघर्ष में सहरसा के इन 6 वीर सपूतों ने अपनी जान की आहुति दी:
- घटनास्थल पर शहीद: बनगांव के हीराकांत झा (16 वर्ष), बनगांव के ही पुलकित कामत (18 वर्ष) और बलहा गढ़िया के कालेश्वर मंडल (22 वर्ष) अंग्रेजों की गोली लगने से मौके पर ही शहीद हो गए.
- घायल होने के बाद शहादत: चैनपुर के भोला ठाकुर और नरियार के केदारनाथ तिवारी गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हुए. भोला ठाकुर ने तीन दिन बाद और केदारनाथ तिवारी ने करीब एक महीने तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद प्राण त्याग दिए.
- जेल की यातनाएं: एकाढ़ के क्रांतिकारी धीरो राय को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया. जेल में दी गई अमानवीय यातनाओं के कारण अंततः उन्होंने भी देश के लिए अपनी जान दे दी.
बनगांव के किशोरों का अदम्य साहस
इस शहादत की कहानी में बनगांव के पुलकित कामत और हीराकांत झा का बलिदान विशेष रूप से झकझोरने वाला है. महज 16 और 18 वर्ष की किशोर उम्र में इन दोनों ने जिस अदम्य साहस का परिचय देते हुए अंग्रेजी बंदूकों का सामना किया, वह प्रमाणित करता है कि कोसी क्षेत्र के ग्रामीण समाज और युवाओं में स्वाधीनता की चेतना कितनी गहराई तक पैठ बना चुकी थी.
'चांदनी चौक' जो शहादत के बाद बन गया 'शहीद चौक'
सहरसा का वह स्थान, जिसे कभी 'चांदनी चौक' कहा जाता था, 1942 की इस ऐतिहासिक घटना के बाद हमेशा के लिए 'शहीद चौक' बन गया. आज यहां शहीदों की याद में एक स्मारक स्थापित है, जहां हर साल 29 अगस्त को इन अमर सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है. स्थानीय लोगों की लंबे समय से मांग है कि इस स्मारक का उचित जीर्णोद्धार और संरक्षण किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी सहरसा की मिट्टी के इस गौरवशाली इतिहास और आजादी की कीमत को समझ सकें.
