एशिया की शान रही बिस्कोमान मिल के अवशेष बेचे गये, रोजगार की उम्मीदें दफन

22 बीघा में फैले औद्योगिक गौरव पर चला कटर, सुरक्षा के नाम पर अवशेषों की नीलामी, बिक्रमगंज की ऐतिहासिक राइस मिल का अंत, कबाड़ में तब्दील हुई विरासत

बिक्रमगंज.

कभी एशिया के औद्योगिक मानचित्र पर अपनी चमक बिखेरने वाली बिक्रमगंज थाना चौक स्थित बिस्कोमान की अत्याधुनिक राइस मिल अब अस्तित्व के अंतिम पड़ाव पर है. 22 बीघा में फैले इस विशाल परिसर के अवशेषों को आज टुकड़ों में काटकर कबाड़ के रूप में बेचा जा रहा है. जिस औद्योगिक परिसर में कभी मशीनों की गूंज और सैकड़ों श्रमिकों की गहमागहमी रहती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है. बिस्कोमान के क्षेत्रीय पदाधिकारी चंदन कुमार की देखरेख में राइस मिल और सॉल्वेंट प्लांट की मशीनों को काटकर हटाया जा रहा है. इस कार्रवाई पर पदाधिकारी का तर्क है कि मशीनों के चोरी होने से बेहतर है कि उनका कुछ उपयोग सुनिश्चित हो जाए. विभागीय योजना के अनुसार, इस कबाड़ की बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग परिसर की चहारदीवारी को ऊंचा करने और सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने में किया जायेगा.

सुरक्षा पर सवाल: जब मशीनें ही नहीं, तो चहारदीवारी क्यों

औद्योगिक संरचना को पूरी तरह नष्ट कर केवल चहारदीवारी बचाने के विभागीय तर्क पर स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं. नागरिकों का कहना है कि जब मिल का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा, तो खाली पड़े मैदान की घेराबंदी का क्या औचित्य रह जायेगा. इस गंभीर विषय पर फिलहाल विभाग के पास कोई संतोषजनक उत्तर उपलब्ध नहीं है. यह परिसर कभी सहकारिता आधारित औद्योगिक मॉडल का उत्कृष्ट उदाहरण हुआ करता था, जो अब केवल यादों में शेष रह गया है.

स्वर्गीय तपेश्वर सिंह का सपना हुआ चकनाचूर

इस मिल का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है. इसकी स्थापना 1940 के दशक में जापानी तकनीक से की गयी थी. बाद में 1980 के दशक में ””””सहकारिता सम्राट”””” के रूप में विख्यात पूर्व सांसद स्वर्गीय तपेश्वर सिंह के प्रयासों से बिस्कोमान ने इसका अधिग्रहण किया था. उनके कार्यकाल में यहां कैटल फीड और सॉल्वेंट प्लांट जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं शुरू की गयी थीं. इससे किसानों को बड़ा बाजार और स्थानीय युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार मिला था. उनके निधन के बाद विकास की यह गति अवरुद्ध हो गयी और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण इकाई खंडहर में तब्दील होती चली गयी.

वर्तमान नेतृत्व से निराशा, वादे रह गये अधूरे

सहकारिता सम्राट के पौत्र और बिस्कोमान के वर्तमान चेयरमैन विशाल सिंह से क्षेत्र के लोगों को बड़ी उम्मीदें थीं. कार्यभार संभालने के बाद बिक्रमगंज दौरे पर उन्होंने इस परिसर के दिन बहुरने का भरोसा दिलाया था. लेकिन मिल को पुनर्जीवित करने के बजाय मशीनों को कबाड़ में तब्दील होता देख लोगों में भारी रोष है. जानकारों की मानें, तो यदि इस उद्योग को आधुनिक तकनीक के साथ दोबारा शुरू किया जाता, तो आज लगभग एक हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिल सकता था. मशीनों को काटकर हटाना केवल एक फैक्ट्री का अंत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की आर्थिक संभावनाओं का विनाश है. इस औद्योगिक पतन के लिए जिम्मेदार कारकों और भविष्य की रिक्तता का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है.

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Published by: Anurag sharan

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