बेल का शरबत लुभा रहा है लोगों को
लस्सी व चने के सत्तू का महत्व नहीं हुआ है कम
सहरसा : कोल्ड ड्रिंक कंपनियों द्वारा प्रचार-प्रसार करने व अपने ब्रांड को स्थापित करने की मारामारी के बावजूद घरेलू पेय पदार्थों एवं लस्सी सहित सत्तू का महत्व कम नहीं हुआ है. इसके अलावा बेल से तैयार शरबत को पीने वालों की भीड़ सड़क किनारे खड़ी रेहड़ियों पर खूब देखी जा रही है. इन पेय पदार्थों का उपयोग करने वालों की भीड़ इसके महत्व को बताने के लिए काफी है. शहर भर में अभी लस्सी एवं सत्तू की लगभग सौ से ज्यादा दुकानें हैं, जहां हर समय कोई न कोई ग्राहक इन स्वदेशी पेय पदार्थों का सेवन करते नजर आ ही जाते हैं. पुराने लोग बताते हैं कि गरमी में सत्तू का सेवन अमृत की तरह होता है. जो शरीर के अंदर पनपने वाली गरमी को ठंडक प्रदान करती है.
सत्तू मतलब स्वदेशी ड्रिंक : गरीब व मेहनतकश लोगों के बीच पूर्व से प्रचलित सत्तू का सेवन अब सभी तबके के लोगों को भाने लगा है. खास कर बाजार में चने के सत्तू की डिमांड काफी बढ़ गयी है. हालांकि बाजार में सत्तू पिलाने वाले प्रतिष्ठानों की तादाद काफी कम है. इसके बावजूद पीने वाले चिह्नत जगहों पर पहुंच ही जाते हैं. चिकित्सक बताते हैं कि सभी प्रकार के मौसम में स्वस्थ व्यक्ति को सौ ग्राम की दर से सत्तू का सेवन करना चाहिए. इससे पाचन क्रिया संबंधी रोगों का त्वरित निदान हो जाता है. इसमें भी मिलावटी सत्तू का सेवन करने से परहेज करना चाहिए.
पेट की गरमी को ठंडा करता है बेल
गरमी के मौसम में स्थानीय बाजार में बेल व उससे बनने वाले शरबत का महत्व काफी बढ़ जाता है. खासकर शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी डिमांड काफी बढ़ जाती है. इन दिनों सड़क किनारे लगे स्टॉलों पर बेल से बने शरबत का चुस्की लेते लोग नजर आने लगे हैं. बेल की अहमियत को देखते शहर के सभी प्रमुख बाजारों व थाना चौक रोड में दर्जनों बेल की दुकान सज गयी है. जहां दस रुपये प्रति गिलास की दर से लोग दर अदा का गरमी से राहत पाने की कोशिश में लगे हुए हैं.
