पुस्तकालय है या पार्टी भवन

उदासीनता. दीवारों पर महापुरुषों के संदेश नहीं, राजनीतिक नारे प्रमंडलीय पुस्तकालय का हाल ही में जीर्णोद्धार हुआ है. 29 दिसंबर को डीएम की मौजूदगी में कमिश्नर ने इसका उद्घाटन किया था. हालांकि इसके जीर्णोद्धार में कोई सहयोग नहीं करने वाले राजनीतिक दल इसकी दीवारों को अपने नारों से गंदा करनेे में सबसे आगे साबित हो […]

उदासीनता. दीवारों पर महापुरुषों के संदेश नहीं, राजनीतिक नारे

प्रमंडलीय पुस्तकालय का हाल ही में जीर्णोद्धार हुआ है. 29 दिसंबर को डीएम की मौजूदगी में कमिश्नर ने इसका उद्घाटन किया था. हालांकि इसके जीर्णोद्धार में कोई सहयोग नहीं करने वाले राजनीतिक दल इसकी दीवारों को अपने नारों से गंदा करनेे में सबसे आगे साबित हो रहे हैं. मामले में स्थानीय प्रशासन भी उदासीन है.
सहरसा : लंबे समय और कड़ी मशक्कत के बाद प्रमंडलीय पुस्तकालय की सूरत बदली, लेकिन उतनी ही तेजी से इसे बदसूरत करने का प्रयास भी शुरू हो गया. सुपर बाजार स्थित प्रमंडलीय पुस्तकालय की दीवारों पर महापुरुषों की उक्ति अथवा उनके संदेश नहीं, बल्कि विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के नारे लिखे हैं. ऐसा लगता है ये पुस्तकालय नहीं किसी पार्टी का भवन है. इन नारों से पुस्तकालय की सुंदरता पर तो ग्रहण लग ही रहा है, प्रशासन की लापरवाही भी उजागर हो रही है.
आवाज नहीं उठायी, कर दिया गंदा: प्रमंडलीय पुस्तकालय की नयी बनी दीवारों को विभिन्न राजनैतिक दलों ने अपने नारे लिख बदसूरत बना दिया है. जहां महापुरुषों की उक्तियां या जीवन को सुधारने के लिए संदेशों का लिखा हुआ होना चाहिए था. वहां किसी ने दिल्ली चलो का नारा दिया है तो किसी ने पटना. किसी ने अपनी रैली में शामिल होने का न्योता दिया है
तो किसी ने सरकार पर अपनी भड़ास निकाली है. लाल-काले मोटे अक्षरों में बदसूरत बना दिये गये इस चहारदीवारी को देख इस भवन के पुस्तकालय होने की जानकारी नहीं मिलती है. राजनीतिक दलों व संगठनों ने दशकों तक बेकार पड़े इस पुस्तकालय के जीर्णोद्धार की कभी आवाज नहीं उठायी थी, लेकिन सज-संवर कर तैयार होते ही इसे गंदा करने में अपनी दिलचस्पी और क्षमता दिखा दी. इस पर प्रशासन की भी कोई निगरानी नहीं दिख रही है.
नहीं आ रहे थे पाठक: डीबी रोड से सुपर बाजार आने के बाद से ही पुस्तकालय की स्थिति बेहद खराब थी, यहां न तो पत्र-पत्रिकाएं आती थी और न ही किताबों की नयी खेप ही. जो पुरानी किताबें थी, वह दीमक चाट चुकी थी. आलमारियों को चूहों ने कुतर कर बरबाद कर दिया था. लगभग एक दशक तक यह पुस्तकालय स्थायी व नियमित पुस्तकालयाध्यक्ष के बिना ही रहा. इस भवन में पाठकों के बैठने की व्यवस्था भी ढंग की नहीं थी और न ही बिजली, पंखा या अन्य सुविधाएं ही थी.
लिहाजा यहां आने वाले पाठकों की संख्या लगातार नगण्य होती चली गयी. बिजली कनेक्शन नहीं होने से कंप्यूटर शोभा की वस्तु बनी रही और सरकार द्वारा दिये गये जेनेरेटर कमिश्नरी ऑफिस में चलते रहे. सिर्फ आदेशपाल भोगी पंडित ससमय व नियमित ड्यूटी बजाते रहे.
साढ़े 28 लाख रुपये की लागत से हुआ है जीर्णोद्धार
प्रभात खबर में लगातार खबर प्रकाशित किये जाने के बाद 2016 में प्रशासनिक अधिकारियों की तंद्रा भंग हुई और पुस्तकालय के जीर्णोद्धार की योजना बनी. स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन द्वारा 28 लाख 58 हजार तीन सौ रुपये की लागत से दो रिडिंग हॉल, दो शौचालय, दो बाथरूम बनवाये गये. पर्याप्त संख्या में कुरसी,
टेबुल व आलमारी की खरीद हुई. घेराबंदी कराये जाने के अलावा वाटर सप्लाई व बिजली कनेक्शन कराया गया. 29 दिसंबर को भव्य समारोह आयोजित कर तत्कालीन कमिश्नर कुंवर जंग बहादुर ने इस प्रमंडलीय पुस्तकालय का लोकार्पण किया था. डीएम, आरडीडीइ व सदर एसडीओ इस समारोह में बतौर अतिथि के रूप में मौजूद थे.

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