बह रही पछुआ हवा, रहें सावधान

जागरूकता. अगलगी का मौसम आ गया, नहीं बदला अग्निशमन विभाग का रवैया ग्रीष्म ऋतु आगमन के समय बहनेवाली पछुआ हवा आग को गति प्रदान करती है और घरों में आग लगने की घटना में वृद्धि होती है. अग्निशमन विभाग का रवैया पहले की तरह ही है, इसलिए इस मौसम में लोगों को सावधानी बरतने की […]

जागरूकता. अगलगी का मौसम आ गया, नहीं बदला अग्निशमन विभाग का रवैया

ग्रीष्म ऋतु आगमन के समय बहनेवाली पछुआ हवा आग को गति प्रदान करती है और घरों में आग लगने की घटना में वृद्धि होती है. अग्निशमन विभाग का रवैया पहले की तरह ही है, इसलिए इस मौसम में लोगों को सावधानी बरतने की जरूरत है.
सहरसा : अगलगी का समय आ गया है. अब दमकल गाड़ियों के सायरन की आवाज लगातार सुनाई देगी. आवाज सुन कर लोग आग लगने के स्थान का पता करेंगे. दरअसल ग्रीष्म ऋतु के आगमन के समय बहने वाली हवा आग को गति प्रदान कर देती है. गांव में लोगों की लापरवाही से हर साल सैकड़ों घर जल जाते हैं. लाखों की संपत्ति का नुकसान हो जाता है. सरकार मरहम लगाने के सिवाय और कुछ नहीं कर पाती है.
होमगार्ड बना फायर मैन:
बिहार अग्निशामक सेवा में नई नियुक्तियां नही होने के कारण जहां अधिकारियों के पद रिक्त हैं. वही विभाग में पानी की तरह ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले फायर मैन के भी सभी पद खाली ही पड़े हैं. जिसके बदले में गृह रक्षा वाहिनी के वृद्ध स्वयं सेवकों से काम लिया जा रहा है. प्रशिक्षण प्राप्त फायर कर्मियों की जगह पर ये होमगार्ड के जवान कितनी मुस्तैदी से अपने काम को अंजाम देते होंगे. इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. मालूम हो कि इन अकुशल कर्मियों को स्वयं की सुरक्षा के लिये आग से बचाव करने वाली जैकेट भी नहीं मिलती है.
राहत देने के सिवा और कुछ नहीं कर पाती है सरकार
बिन पानी कैसे बुझेगी आग
अग्निशमन विभाग की स्थापना को इस वर्ष बीत चुके हैं. लेकिन सरकार विभाग को अभी तक बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया नहीं करा सकी है. सूबे के सबसे बड़े जल क्षेत्र में होने के बाद भी विभाग के टैंकर पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं. जिसके कारण राहत कार्य में विभाग स्वयं को अक्षम मान रहा है. आग लगने पर विभाग पानी की तलाश में भटकता रह जाता है और तब तक सब कुछ खाक हो चुका होता है.
सहरसा में कुल स्वीकृत 17 पद में से 13 कर्मचारी ही कार्यरत हैं. जिनमें विभाग के मात्र पांच, दो चालक और होमगार्ड के छह जवान है. यहां और अधिक कर्मियों की जरूरत है.
फिर भी किसी तरह काम चलाया जा रहा है. राहत कार्य के लिए पानी ही हमारी सबसे बड़ी जरूरत होती है. लेकिन विभाग के पास इसके लिए कोई प्रबंध नहीं है. तत्काल स्टैटिक टैंक एवं मोटर लगा दिया जाता तो टैंकरों को पानी लोड करने में आसानी होती. अग्निशामक विभाग ने दो टेलीफोन नंबर 101, 223310 जारी किया है. लेकिन आवश्यकता पड़ने पर दोनों में से कोई नंबर काम नहीं करता है.
संजय कुमार सिंह, प्रभारी अग्निशामक पदाधिकारी
दो जोड़ी गाड़ी के भरोसे है जिला
अग्निशामक विभाग द्वारा तो जिला को फायर बिग्रेड की छह गाड़ियां मुहैया करायी गयी थी. लेकिन तकनीकी खराबी के वजह से सिर्फ चार गाड़ी ही चलने के लायक बची हुई है. जिनमें से एक महिषी व एक सिमरी बख्तियारपुर भेज दी गई है. यहां बची एक बड़ी गाड़ी भगवान भरोसे ही चलती है. एक समय में एक से अधिक जगह आग लगने पर विभाग में अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है. जिले के 172 पंचायत एवं 40 शहरी वार्डों में राहत के नाम पर ये टैंकर सिर्फ खानापूर्ति ही कर पाते हैं. विभागीय मानक के अनुसार इस क्षेत्र में समय पर राहत कार्य निष्पादित करने के लिए 12 अग्निशामक वाहन की आवश्यकता है. सिमरी अनुमंडल में कार्यालय खुलने के बाद एक दमकल को सिमरी बख्तियारपुर में सेवा प्रदान करने के लिये दे दिया गया है.
तीन महीने जलती रहती हैं झोंपड़ियां
वर्ष में लगभग तीन माह ऐसे जरूर होते हैं, जब गरीबों की हजारों झोंपडियां जल जाती है. कई मानव व पशुओं की मौत हो जाती है और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान होता है. इसे रोका तो फिलहाल नहीं जा सकता. लेकिन ऐसी घटनाओं से होने वाले नुकसान में कमी जरूर लाई जा सकती है. विडंबना है कि ऐसा नहीं हो रहा है. घर के चूल्हे अथवा मवेशियों के पास जलाये जाने वाले घूर से निकली हल्की सी चिंगारी को यह हवा विकराल बना देती है. नतीजा धूं-धूं कर जलता है घर. गरीबों के घर फूस व लकड़ी के बने होते हैं. जो आग की तपन को और बढ़ा देती है. जब तक लोग संभल पाते हैं तब तक तो सैकडों घरों को आग लील लेती है. गरीबों के सारे सपने आग की भेंट चढ़ जाते हैं. पिछले दो वर्षों में जिले के डेढ़ सौ गांवों के लगभग डेढ़ हजार परिवारों को आग ने ऐसा जलाया कि अभी तक वे संभल नहीं पाये हैं. बीते वर्ष ही सौ से ज्यादा घर आग की भेंट चढ़ चुके हैं. सरकारी सहायता के रुप में दी जाने वाली राशि नाकाफी होती है. अपना सब कुछ गंवा देने वालों परिवारों को मामूली राहत उपलब्ध करवा कर प्रशासन अपने कर्तव्यों का इति श्री मान लेती है. इन सबके बाद जिक्र आता है फायर बिग्रेड का. कभी भी समय पर न आने के रुप में पहचाने जाने वाला यह विभाग खुद समस्याओं से घिरा है. मालूम हो कि शहरी क्षेत्र में सड़के कम चौड़ी होने की वजह से बड़ी गाड़ी राहत नहीं पहुंचा पाती है. जबकि पूर्व से ही अग्निशामक विभाग में छोटे वाहनों की खरीद नहीं की गयी है.

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