पूर्णिया जिले के बड़हराकोठी प्रखंड अंतर्गत सुखसेना गांव में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि 286 वर्षों से चली आ रही लोक आस्था और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है. आधी रात को कान्हा के प्राकट्योत्सव के साथ ही यहां 4 और 5 सितंबर को दो दिवसीय (कुल तीन दिवसीय उत्सव) भव्य मेले का आयोजन किया जा रहा है. सुखसेना के इस ऐतिहासिक मेले की सबसे अनूठी और विख्यात परंपरा यह है कि दूर-दराज से श्रद्धालु अपने नवजात और छोटे बच्चों को लेकर यहां पहुंचते हैं और भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में चांदी की बांसुरी अर्पित कर उनके मेधावी व यशस्वी होने की मन्नत मांगते हैं.
बच्चों से चांदी की बांसुरी चढ़ाने की पौराणिक मान्यता
मेला कमेटी के अध्यक्ष शारदानंद मिश्र ने इस विशिष्ट परंपरा के महत्व को रेखांकित किया:
- भगवान की प्रिय वस्तु: मान्यता है कि मुरलीधर को बांसुरी सर्वाधिक प्रिय है. जो अभिभावक अपने नन्हे बच्चों के हाथों से भगवान कृष्ण को चांदी की बांसुरी अर्पित करवाते हैं, उनके बच्चे कुशाग्र बुद्धि, संस्कारी और अत्यंत प्रतिभाशाली होते हैं.
- कमेटी उपलब्ध कराती है बांसुरी: सामाजिक समरसता को बनाए रखने के लिए पूजा समिति स्वयं न्यूनतम और रियायती दरों पर चांदी की बांसुरी उपलब्ध कराती है, ताकि निर्धन से लेकर संपन्न वर्ग तक का हर परिवार अपनी सामर्थ्य के अनुसार कान्हा को मुरली भेंट कर सके.
191 साल पहले जमींदार बलदेव झा को मिला था जीर्णोद्धार का जिम्मा
राधा उमाकांत महाविद्यालय के प्राचार्य पंडित अमरनाथ झा ने मंदिर के ऐतिहासिक दस्तावेजों और अतीत पर प्रकाश डाला:
- ऐतिहासिक बैठक: सुखसेना में श्रीकृष्ण स्थान अति प्राचीन काल से स्थापित है. लगभग 191 वर्ष पूर्व मंदिर के समग्र जीर्णोद्धार और विस्तार के लिए गांव में प्रबुद्धजनों की एक ऐतिहासिक बैठक आयोजित की गई थी.
- जमींदार को दायित्व: उस बैठक में मंदिर के जीर्णोद्धार की मुख्य जिम्मेदारी सुखसेना गांव के तत्कालीन प्रतिष्ठित जमींदार बलदेव झा को सौंपी गई. कालांतर में ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से वहां संगमरमर और नक्काशीदार भव्य मंदिर का स्वरूप खड़ा किया गया.
सुखसेना श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: मुख्य तथ्य एक नज़र में
| बिंदु (Key Aspects) | ऐतिहासिक व वर्तमान विवरण (Details) |
| स्थान / प्रखंड | ग्राम सुखसेना, प्रखंड बड़हराकोठी, जिला पूर्णिया |
| ऐतिहासिक परंपरा | विगत 286 वर्षों से निरंतर जारी |
| मेले की तिथियां | 4 और 5 सितंबर (जन्माष्टमी मध्यरात्रि से प्रारंभ) |
| विशिष्ट परंपरा | नवजात व छोटे बच्चों द्वारा चांदी की बांसुरी का अर्पण |
| पुश्तैनी पुरोहित | पुजारी धोगन झा एवं उनके पूर्वज (शुरुआती दौर से पूजा का दायित्व) |
| मूर्तिकार | स्थानीय ग्रामीण कलाकार पंकज कुमार |
| सांस्कृतिक ख्याति | विख्यात तबला वादक मिथिलेश झा सहित राष्ट्रीय रंगकर्मियों की भूमि |
स्थानीय कलाकार गढ़ रहे प्रतिमाएं, नाटकों की परंपरा होगी पुनर्जीवित
- पीढ़ी-दर-पीढ़ी सेवा: मंदिर के पुजारी धोगन झा ने बताया कि जब से यानी करीब पौने तीन सौ साल पहले यह मेला शुरू हुआ था, तभी से उनके पूर्वज मुख्य अर्चक के रूप में भगवान की सेवा और वैदिक पूजा कराते आ रहे हैं.
- गांव की मिट्टी में कला: जन्माष्टमी के लिए भगवान की नयनाभिराम प्रतिमाओं का निर्माण गांव के ही कुशल मूर्तिकार पंकज कुमार द्वारा पूरी श्रद्धा और बारीकी से किया जा रहा है.
- रंगमंच और सांस्कृतिक संध्या: सुखसेना गांव की पहचान संगीत और अभिनय से रही है. यहां के तबला वादक मिथिलेश झा सहित कई कलाकारों ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ख्याति पाई है. इस बार भी मेला कमेटी और ग्रामीण युवाओं द्वारा पारंपरिक नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भव्य मंचन किया जा रहा है.
