पूर्णिया जिले के कसबा प्रखंड स्थित प्रसिद्ध राणीसती दादी मां का मंदिर केवल बिहार ही नहीं, बल्कि देश-विदेश में अपनी अटूट आस्था और धार्मिक पहचान के लिए जाना जाता है. मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से दादी मां के दरबार में हाजिरी लगाता है, उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं. यही वजह है कि यहां प्रतिदिन स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों और पड़ोसी देश नेपाल से बड़ी संख्या में भक्त आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचते हैं.
वर्ष में दो बार सजता है भव्य महोत्सव
मंदिर में साल में दो बार विशेष वार्षिक धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन अत्यंत भव्य रूप से किया जाता है:
- भदवा और मार्गशीर्ष महोत्सव: पहला आयोजन भाद्रपद मास में 'भदवा महोत्सव' के रूप में और दूसरा माघ/मार्गशीर्ष मास में 'मार्गशीर्ष महोत्सव' के रूप में मनाया जाता है. इन अवसरों पर मंदिर परिसर में देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है.
- दैनिक वृहत आरती: दादी मां के दरबार में प्रतिदिन सुबह और शाम वृहत आरती का आयोजन होता है. इस पावन आरती में शामिल होने के लिए स्थानीय व बाहरी भक्त काफी संख्या में उपस्थित होते हैं.
1968 में हुई थी मंदिर की स्थापना: जानें स्वर्णिम इतिहास
राणीसती दादी मां का इतिहास लगभग 700 वर्ष पुराना माना जाता है:
- सती होने की कथा: दादी मां हरियाणा के मिमानी देवसर गांव में संवत 1352 (मार्गशीर्ष कृष्ण नवमी, मंगलवार) को सती हुई थीं.
- स्वप्न और कसबा आगमन: संवत 2023 की भाद्रपद अमावस्या को दादी मां ने बराकर निवासी झुनझुनवाला को स्वप्न में पूर्णिया में मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया. इसके बाद वे कटिहार पहुंचे, जहां कसबा निवासी नंदलाल लाठ से उनकी भेंट हुई.
- प्राण प्रतिष्ठा: वर्ष 1966 में मंदिर की आधारशिला रखी गई और 1968 में भव्य समारोह आयोजित कर प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई.
मंदिर संचालन हेतु कमेटी
वर्तमान में मंदिर के रख-रखाव, दैनिक व्यवस्थाओं और वार्षिक आयोजनों का संचालन एक समर्पित मंदिर कमेटी द्वारा सुचारू रूप से किया जाता है. मंदिर की प्रसिद्ध और ऐतिहासिक महत्ता के कारण ही कसबा के प्रमुख चौराहे का नाम 'राणीसती चौक' पड़ा है.
