पूर्णिया. विविध पारंपरिक और सांस्कृतिक धरोहरों से समृद्ध भारतीय कला संस्कृति को सहेजने तथा नयी पीढ़ी को विलुप्तप्राय लोकगीत और लोकनृत्य से रू-ब-रू कराने के लिए कला एवं संस्कृति विभाग और जिला प्रशासन की ओर से आयोजित 15 दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम चर्चा का विषय बना हुआ है. प्रशिक्षण में शामिल विभिन्न आयु वर्ग के प्रतिभागियों में भी उत्साह देखा जा रहा है.
25 अगस्त से 8 सितंबर तक चल रहा निःशुल्क प्रशिक्षण
कला एवं संस्कृति विभाग तथा जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वावधान में स्थानीय प्रेक्षागृह सह आर्ट गैलरी स्थित आम्रपाली प्रशिक्षण केंद्र में 25 अगस्त से 8 सितंबर तक निःशुल्क कार्यशाला आयोजित की गयी है. प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को बिहार की समृद्ध लोक परंपराओं से जुड़ी विभिन्न विधाओं का व्यावहारिक अभ्यास कराया जा रहा है.
छठे दिन झूमर, बारहमासा और सोहर का कराया गया अभ्यास
विलुप्तप्राय लोकगीत एवं लोकनृत्य प्रशिक्षण कार्यक्रम के छठे दिन प्रतिभागियों को झूमर, बारहमासा, चौमासा, कजरी और सोहर लोकगीतों का गहन अभ्यास कराया गया. प्रशिक्षकों ने प्रतिभागियों को इन पारंपरिक लोक विधाओं के स्वरूप, गायन शैली और प्रस्तुति से संबंधित जानकारी भी दी.
कजरी और झिझिया लोकनृत्य की बारीकियां सीखीं
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को कजरी एवं झिझिया लोकनृत्य का भी अभ्यास कराया गया. प्रशिक्षकों ने लोक विधाओं के मूल और पारंपरिक स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए कलाकारों को बेहतर मंचीय प्रस्तुति के गुर सिखाए. प्रतिभागियों ने लोकगीतों और लोकनृत्यों की विभिन्न बारीकियों को समझते हुए अभ्यास किया.
नयी पीढ़ी तक लोक संस्कृति पहुंचाना मुख्य उद्देश्य
जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी पंकज कुमार पटेल ने बताया कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बिहार की विलुप्तप्राय लोकगीत और लोकनृत्य विधाओं को जीवंत बनाए रखना तथा उन्हें नयी पीढ़ी तक पहुंचाना है. उन्होंने कहा कि बिहार की लोक कलाएं और सांस्कृतिक परंपराएं हमारी महत्वपूर्ण धरोहर हैं, जिन्हें संरक्षित करना जरूरी है.
इच्छुक कलाकार करा सकते हैं पंजीकरण
जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी ने बताया कि इच्छुक कलाकार और स्थानीय नागरिक प्रेक्षागृह सह आर्ट गैलरी, पूर्णिया पहुंचकर अपना पंजीकरण करा सकते हैं. उन्होंने लोगों से इस सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने के अभियान से जुड़ने की अपील की.
