पर्युषण महापर्व 2026: गुलाबबाग तेरापंथ भवन में मनाया गया क्षमायाचना दिवस, जैन समाज ने लिया सर्वजीव मैत्री का संकल्प

सीमांचल के गुलाबबाग में पर्युषण महापर्व के पावन अवसर पर भव्य 'क्षमायाचना दिवस' का आयोजन हुआ. जैन समाज के लोगों ने मन, वचन और काया से हुई भूलों के लिए परस्पर क्षमा मांगी. इस अवसर पर आचार्य महाश्रमण के निर्देशन में विद्वानों ने क्षमा के महत्व पर प्रकाश डाला.

सीमांचल के प्रमुख व्यावसायिक केंद्र गुलाबबाग स्थित तेरापंथ भवन में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्म संघ के आठ दिवसीय महापर्व पर्युषण के पावन अवसर पर भव्य 'क्षमायाचना दिवस' (संवत्सरी महापर्व) का आयोजन किया गया.

तेरापंथ धर्म संघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन निर्देशन में गुलाबबाग पधारे विद्वान उपासक प्राध्यापक निर्मल नौलखा एवं सहयोगी उपासक नवरतन बेंगानी के मंगल सान्निध्य में यह आध्यात्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ. धर्मसंघ के इस सर्वोच्च पर्व में गुलाबबाग और आसपास के संपूर्ण जैन समाज ने अगाध श्रद्धा, संयम और भक्तिभाव के साथ सहभागिता की.

मन, वचन और काया से की गई भूलों की मांगी क्षमा

क्षमायाचना पर्व के दौरान उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने विगत एक वर्ष के अंतराल में जाने-अनजाने, प्रमादवश मन, वचन अथवा कर्म से हुई तमाम गलतियों, कटु वचनों और आचरण के लिए परस्पर हाथ जोड़कर एक-दूसरे से क्षमा याचना की.

'मिच्छामि दुक्कड़म' और 'खमत खामना' के पवित्र भाव के साथ समाज के सभी वर्गों—वृद्ध, युवा और बच्चों ने खुले व सरल हृदय से एक-दूसरे के प्रति किसी भी प्रकार की गांठ, दुर्भाव, अहंकार और वैमनस्य को समाप्त कर क्षमा दी और क्षमा मांगी. इसके साथ ही 'मित्ती मे सव्व भूएसु' के शाश्वत सिद्धांत को आत्मसात करते हुए संसार के समस्त सूक्ष्म व स्थूल जीवों के प्रति सार्वभौमिक मैत्री और करुणा का सामूहिक संकल्प लिया गया.

क्षमा मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का मार्ग: प्रो. निर्मल नौलखा

समारोह को संबोधित करते हुए प्राध्यापक उपासक निर्मल नौलखा ने कहा कि क्षमायाचना दिवस जैन दर्शन की सर्वोच्च मानवीय परंपरा का जीवंत प्रतीक है. यह पर्व बाहरी आडंबरों से दूर हटकर स्वयं के भीतर झांकने, आत्ममंथन करने और अपने अंतर्निहित दोषों को साहसपूर्वक स्वीकार करने की प्रेरणा देता है.

उन्होंने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी चार कषायों का त्याग किए बिना आत्मा विशुद्ध नहीं हो सकती. क्षमा याचना करना किसी व्यक्ति की कायरता या दुर्बलता नहीं, बल्कि यह असाधारण आत्मबल, आंतरिक शुद्धि और परम विनम्रता का सबसे बड़ा परिचायक है.

'खमत खामना' केवल शब्द नहीं, आचरण में सुधार का संकल्प

इस पावन बेला पर सभा के वरिष्ठ पदाधिकारियों एवं प्रबुद्धजनों ने भी अपने विचार व्यक्त किए. वक्ताओं ने रेखांकित किया कि 'खमत खामना' केवल औपचारिक रूप से बोला जाने वाला शब्द नहीं है, बल्कि यह अपने दैनिक आचरण को परिष्कृत करने तथा समाज में प्रेम, सौहार्द, शांति और भाईचारा स्थापित करने का दृढ संकल्प है.

सभी सदस्यों ने पारस्परिक क्षमा भाव को जीवनशैली में शामिल करते हुए पारिवारिक, सामाजिक एकता और सद्भाव को निरंतर प्रगाढ़ बनाने पर बल दिया.

अहिंसा, संयम और मानवीय मूल्यों को अपनाने का आह्वान

कार्यक्रम के समापन सत्र में तेरापंथ समाज की ओर से समस्त श्रावक-श्राविका समाज को संवत्सरी महापर्व की मंगल बधाई दी गई. साथ ही सभी से आह्वान किया गया कि वे पर्युषण के दौरान अर्जित आध्यात्मिक ऊर्जा को दैनिक जीवन में बनाए रखें.

उपस्थित जनसमूह ने अपने जीवन में सदाचार, अहिंसा, संयम, अपरिग्रह और मानवता के उच्च आदर्शों को आत्मसात करने का सामूहिक संकल्प दोहराया.

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लेखक के बारे में

By अखिलेश चंद्रा

अखिलेश चंद्रा प्रिंट माध्यम में 30 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति की खबरों में रुचि रखते हैं.

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