मखाना के बाद अब जूट को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की शुरू हुई मुहिम

मखाना के बाद अब जूट को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने की मुहिम शुरू हो गयी है.

जूट व पूर्णिया आर्ट एंड क्राफ्ट को जीआइ टैग को ले प्रक्रिया तेज

देश में जूट के कुल उत्पादन की 80 फीसदी खेती पूर्णिया और कोशी में

पूर्णिया. मखाना के बाद अब जूट को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने की मुहिम शुरू हो गयी है. मखाना की तरह जूट भी पूर्णिया-कोशी समेत पूरे सीमांचल का मुख्य ‘कैश क्रॉप’ है. इस इलाके में आज भी बड़े पैमाने पर जूट की खेती की जा रही है. इसके लिए जूट और पूर्णिया आर्ट और क्राफ्ट को जीआइ टैग दिलाने का प्रयास किया जा रहा है. यहां जूट और जूट एवं प्राकृतिक रेशे से विशेष शैली में पूर्णिया आर्ट एवं पूर्णिया क्राफ्ट का काम हो रहा है. जूट को पूर्णिया क्षेत्र के धरोहर के रूप में जिन्दा रखा जा सके और एक विशेष शैली में पूर्णिया आर्ट और क्राफ्ट को भी पूर्णिया की समृद्ध विरासत का एक हिस्सा बनाया जा सके ताकि पूर्णिया को इन दो महत्वपूर्ण उत्पादों के नाम से जाना जाए. इसके साथ ही हमेशा की तरह किसानों के बीच जूट की फसल की पहचान कायम रहे.

गौरतलब है कि मक्का और मखाना से पहले इस इलाके की एकमात्र नकदी फसल के रूप में जूट की खेती की जाती रही है. आज के दौर में भी देश में जूट के कुल उत्पादन की 80 फीसदी खेती पूर्णिया और कोसी में होती है. हालांकि गुजरते वक्त के साथ जूट की खेती का रकबा सिमटता गया पर अभी भी कैश क्रॉप के रूप में इसकी खेती हो रही है. आंकड़ों की मानें तो पूर्णिया और कोसी प्रमंडल में एक लाख 20 हजार 129 हेक्टेयर में जूट की खेती हो रही है. किसान मानते हैं कि उनके लिए जूट फिक्स डिपॉजिट जैसी फसल है. जूट की रकम बेटियों के ब्याह, मांगलिक कार्यक्रम अथवा किसी विपत्ति के मौके पर काम आती है. जूट पर किसानों का वर्तमान ही नहीं, भविष्य की भी उम्मीदें टिकी होती हैं. यही वजह है कि पूर्णिया और कोसी प्रमंडल को आज भी जूट बहुल क्षेत्र माना जाता है. यही वह फसल है, जिस पर बेटियों का ब्याह, महाजन की कर्ज अदायगी और घर की अन्य जिम्मेवारियों के निर्वाह का भरोसा टिका होता है. नकदी फसल होने के कारण जूट की खेती अभी भी हो रही है.

महिलाओं के रोजगार सृजन की रचनात्मक पहल

बदलते दौर में पूर्णिया आर्ट और क्राफ्ट के जरिये पिछले कई सालों से न केवल महिलाओं को जोड़ कर रोजगार सृजन की अलग पहल की गयी है, बल्कि भारत सरकार के एमएसएमई मंत्रालय के अधीन देश के सबसे बड़े जूट और नेचुरल बनाना फाइबर क्लस्टर में दिन रात नये नये उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं. जूट और मखाना किसानों का एकमात्र अतुल्यम मल्टी स्टेट मल्टी परपस को-ऑपरेटिव सोसाइटी के अध्यक्ष एवं समाजसेवी बिनोद आशीष यह कोशिश कर रहे हैं कि इस संस्था को जीआइ टैग मिल जाए, ताकि मखाना की तरह अंतर्राष्ट्रीय फलक पर पूर्णिया के जूट को नयी पहचान मिल सके. इसके लिए संबंधित विभाग से बातचीत एवं अन्य अनिवार्य प्रक्रिया पर जारी है. श्री आशीष बताते हैं कि यह सौभाग्य की बात है कि पूर्णिया निवासी किशोर कुमार रॉय उर्फ गुलुदा इस विधा को विगत 40 वर्षो से जिन्दा रखा है. गुलुदा पूर्णिया आर्ट एवं क्राफ्ट को अलग पहचान दिलाने वाले एक मात्र कलाकार हैं.

अब तक जिन उत्पादों को जीआइ टैग मिला है, उसमें पूर्णिया कहीं भी शामिल नहीं है. पूर्णिया एग्रीकल्चर कॉलेज की पहल पर पूर्णिया में उत्पादित होने वाले मखाना को पूर्णिया की ही संस्था को जीआइ टैग मिला पर उसे मिथिला का नाम दिया गया. हमारी कोशिश है कि पूर्णिया जूट आर्ट और क्राफ्ट को इसी नाम से जीआइ टैग मिल जाए. इसके लिए लंबी लड़ाई के लिए भी हम तैयार और तत्पर हैं.

बिनोद आशीष, अध्यक्ष, अतुल्यम मल्टी स्टेट मल्टी परपस को-ऑपरेटिव सोसाइटीB

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Author: ARUN KUMAR

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >