पूर्णिया से अखिलेश चन्द्रा की रिपोर्ट
Aaj Ka Darshan: पूर्णिया शहर से करीब सात किलोमीटर दूर सौरा नदी के शांत तट पर स्थित जगन्नाथ मंदिर इन दिनों एक बार फिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. आषाढ़ महीने में जैसे ही रथयात्रा का समय आता है, मंदिर परिसर जय जगन्नाथ के उद्घोष से गूंज उठता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हैं और स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देते हैं. यही वजह है कि इस ऐतिहासिक रथयात्रा को देखने के लिए लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.
300 साल से जल रही आस्था की लौ
पूर्णिया सिटी का यह जगन्नाथ मंदिर करीब 300 वर्ष पुराना माना जाता है. स्थानीय परंपराओं और जानकारों के अनुसार, वैष्णव संप्रदाय के संतों ने इस मंदिर की स्थापना की थी. तभी से यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की नियमित पूजा-अर्चना होती आ रही है. तीन शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवित है.
क्यों खास है पूर्णिया का जगन्नाथ मंदिर?
यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि वैष्णव परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है. मंदिर की पूजा-पद्धति वैष्णव संप्रदाय की मान्यताओं पर आधारित है. यही कारण है कि यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर उनकी सांस्कृतिक पहचान का भी अहम हिस्सा है.
जब भगवान निकलते हैं नगर भ्रमण पर
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकलने वाली रथयात्रा इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण है. फूलों से सजे भव्य रथ पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा विराजमान होकर नगर भ्रमण करते हैं. मान्यता है कि इस दौरान भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच पहुंचकर उनकी खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं. रथयात्रा के दौरान पूरा इलाका भक्ति, उत्साह और श्रद्धा के रंग में रंग जाता है.
Aaj Ka Darshan: आस्था और संस्कृति का संगम
पूर्णिया का जगन्नाथ मंदिर आज भी लोगों को अपनी ऐतिहासिक विरासत से जोड़ने का काम कर रहा है. बदलते समय के बावजूद यहां की परंपराएं और श्रद्धा आज भी वैसी ही बनी हुई हैं. यही कारण है कि यह मंदिर न सिर्फ पूर्णिया, बल्कि पूरे सीमांचल क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन चुका है.
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