पटना : मेरे हॉस्पिटल में आइए, वहीं मरीज देखूंगा

आनंद तिवारी आइजीआइएमएस इमरजेंसी वार्ड के कुछ डॉक्टर निजी अस्पताल से मिल करते कमीशनखोरी अस्पताल में बेड फुल होने का बनाया जाता बहाना पटना : मैं (डॉक्टर) आज आइजीआइएमएस इमरजेंसी वार्ड नहीं आ सकता. आपको मरीज दिखाना है, तो मेरे हॉस्पिटल में आ जाइए. वहीं, देख लूंगा. लेकिन (रिपोर्टर) सर आप तो आइजीआइएमएस में नौकरी […]

आनंद तिवारी
आइजीआइएमएस इमरजेंसी वार्ड के कुछ डॉक्टर निजी अस्पताल से मिल करते कमीशनखोरी
अस्पताल में बेड फुल होने का बनाया जाता बहाना
पटना : मैं (डॉक्टर) आज आइजीआइएमएस इमरजेंसी वार्ड नहीं आ सकता. आपको मरीज दिखाना है, तो मेरे हॉस्पिटल में आ जाइए. वहीं, देख लूंगा. लेकिन (रिपोर्टर) सर आप तो आइजीआइएमएस में नौकरी करते हैं न?
अरे आज मैं वहां नहीं जा पा रहा हूं. मरीज के परिजन और चिकित्सक के बीच सेलफोन पर हुई इस बातचीत से पता चलता है कि संबंधित अस्पताल के चिकित्सक किस तरह कमीशन के लालच में मरीजों को निजी अस्पतालों में बुला रहे हैं. इसके पीछे अस्पताल में बेड फुल होने का बहाना बनाया जाता है. बातचीत खत्म होने के पांच मिनट बाद खुद को आइजीआइएमएस के सरकारी डॉक्टर बताने वाले व्यक्ति के इशारे पर निजी अस्पताल की एंबुलेंस इमरजेंसी के गेट पर आ जाती है. सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों की लालच की यह तस्वीर प्रभात खबर ने स्टिंग ऑपरेशन में कुछ इस तरह उतारी है.
पांच हजार एंबुलेंस वाले, 20 हजार कमीशन लेते हैं डॉक्टर
स्टिंग में पता चला कि इमरजेंसी वार्ड से निजी अस्पताल में एक मरीज को भेजने पर 20 से 25 हजार कमीशन मिलता है. मरीज को भेजने वाले डॉक्टर को 15 व एंबुलेंस ड्राइवर को 5 से 10 हजार कमीशन निजी अस्पताल की ओर से दिया जाता है. पता चला है कि रोजाना पांच से सात मरीजों
को संबंिधत एक अस्पताल में रेफर किया जा रहा है. वहीं, मरीजों की मानें, तो संबंधित अस्पताल के डॉक्टर सीधे मरीज को आइसीयू या इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कर देते हैं और एक सप्ताह इलाज के दौरान पांच से 10 लाख तक का बिल दे देते हैं. सिस्टम की लापरवाही से मरीजों को लाखों रुपये भुगतान करना पड़ रहा है.
यह हुआ खुलासा
स्टिंग में सामने आया कि कई निजी अस्पतालों में बहुत ही बड़े स्तर पर दलालों का नेटवर्क काम कर रहा है. इमरजेंसी वार्ड में काम करने वाले कुछ डॉक्टर निजी अस्पताल से मिल कर दलालों के माध्यम से मरीज को वहां रेफर करते हैं. मरीजों को ले जाने के लिए आधा दर्जन दलाल आइजीआइएमएस में डेरा डाले हुए हैं. एंबुलेंस दलालों की मानें, तो यह पूरा खेल एक डॉक्टर के इशारे पर होता है. इसके लिए दलाल से लेकर इमरजेंसी के कुछ डॉक्टरों को मोटा कमीशन दिया जाता है.
मरीज को भेजने वाले डॉक्टर से सीधी बातचीत
रिपोर्टर : आप डॉ साहब बोल रहे हैं?
डॉक्टर : हां बोल रहा हूं, आप कौन?
रिपोर्टर : मैं मरीज का परिजन, मरीज को भर्ती कराना है
डॉक्टर : ओके, आपके पास एंबुलेंस है?
रिपोर्टर : नहीं है सर, आप आइजीआइएमएस में ही हैं न?
डॉक्टर : हां, लेकिन मैं अपना निजी अस्पताल संचालित करता हूं. आपके नंबर पर मेरे एंबुलेंस का ड्राइवर फोन करेगा और उसके साथ सीधे मेरे अस्पताल आ जाइए.
बहुत ही गलत बात
अगर इमरजेंसी वार्ड से मरीज को निजी अस्पताल में भेजा जा रहा है, तो यह बहुत ही गलत बात है. आपने जो ऑडियो व फोटो भेजे हैं, उसकी जांच की जायेगी. इसके अलावा कौन डॉक्टर इमरजेंसी में आ रहे हैं, इसकी जांच होगी. सीसीटीवी फुटेज के आधार पर कार्रवाई की जायेगी.
डॉ मनीष मंडल, एमएस, आइजीआइएमएस
निजी अस्पतालों के डॉक्टरों का रहता है जमावड़ा
स्टिंग ऑपरेशन में पता चला है कि कई ऐसे डॉक्टर हैं, जो आइजीआइएमएस से नौकरी छोड़ कर और अपने प्राइवेट प्रैक्टिस में लगे हुए हैं. उन डॉक्टरों का मोह संस्थान से भंग नहीं हुआ और वह रोजाना इमरजेंसी वार्ड में मरीजों को अपने अस्पताल में लेने को आते हैं. इसके लिए वह इमरजेंसी वार्ड के डॉक्टरों से मिल कर मरीजों को अपने अस्पताल में रेफर भी कराते हैं.
एंबुलेंस के ड्राइवर से सीधी बातचीत
ड्राइवर : आप डॉ सर के मोबाइल पर फोन किये थे. उनके अस्पताल में मरीज ले जाना है क्या?
रिपोर्टर : हां, आप कौन?
ड्राइवर : मैं उनका ड्राइवर बोल रहा हूं, आप अभी कहां हैं?
रिपोर्टर : मैं आइजीआइएमएस के इमरजेंसी गेट के सामने हूं
ड्राइवर : मैं हाथ उठा रहा हूं मुझे देखिए, नीले रंग का जैकेट पहना हूं
रिपोर्टर : डॉ साहब आइजीआइएमएस में ही नौकरी करते हैं न?
ड्राइवर : हां इमरजेंसी वार्ड के अलावा निजी अस्पताल में भी मरीज को देखते हैं.

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