अनुज शर्मा, पटना : हर साल महंगाई बढ़ रही है. जरूरत की हर चीज महंगी हो रही है. रिश्वत भी इससे बची नहीं है. आम आदमी की आमदनी में भले कछुआ चाल से बढ़ रही है, लेकिन रिश्वतखोरी महंगाई से भी अधिक उछाल मार रही है. राज्य में 13 साल में रिश्वत की दरें सोने के भाव की तरह बढ़ गयी हैं.
जहां वर्ष 2006 में पांच सौ रुपये रिश्वत से काम चल जा रहा था, वहीं अब दस हजार रुपये से कम कोई नही छू रहा. विजिलेंस विभाग ने 2006 से एक अगस्त, 2019 तक भ्रष्टाचार के करीब 3820 मामले दर्ज किये हैं. इनमें रिश्वत के साथ रंगे हाथ पकड़े जाने वाले ट्रैप के 885 मामले हैं. रंगे हाथ पकड़े गये सरकारी सेवकों के रिश्वत लेने के ये आंकड़े बताते हैं कि 2006 में न्यूनतम पांच सौ रुपये की रिश्वत ली गयी थी. लेकिन, 2019 में किसी ने दस हजार से कम रिश्वत नहीं पकड़ी.
वहीं, 2006 में सबसे अधिक एक लाख रुपये रिश्वत के साथ सीतामढ़ी के जेल अधीक्षक प्रेम कुमार पकड़े गये थे, जबकि 2019 में आठ जून को सुरेश प्रसाद सिंह, कार्यपालक अभियंता, पथ निर्माण विभाग पटना- 14 लाख के साथ पकड़े गये. रिश्वत के पैटर्न में इतना अंतर आया है.
शिक्षक भी इसमें पीछे नहीं रहे. 14 मार्च, 2009 में नालंदा के एक राजकीयकृत हाइस्कूल के विज्ञान के शिक्षक 600 रुपये लेते पकड़े गये थे. कुल मामलों में 12 केस एक हजार से कम रिश्वत के हैं. 2009 के बाद एक भी ऐसा मामला नहीं आया, जिसमें रिश्वत में ली गयी रकम एक हजार रुपये से कम थी.
20 गुनी बढ़ीं रिश्वत की दरें 13 साल में, भ्रष्टाचार के करीब 3820 मामले दर्ज
500 से 14 लाख तक की रिश्वत के साथ पकड़े गये 3820 लोग
दो साल में सबसे अधिक रिश्वत के साथ पकड़े गये सरकारी सेवक
सुरेश प्रसाद सिंह, कार्यपालक अभियंता, पथ निर्माण विभाग पटना- 14 लाख
ओमप्रकाश , एडीएम, बेगूसराय, छह लाख
राजाराम सिंह , उजरत अमीन, नालंदा, पांच लाख
मनोज कुमार चौधरी, कार्यपालक अभियंता, पीएचइडी, बांका, चार लाख
राजीव रंजन, पीओ मनरेगा, सहरसा, दो लाख, 57 हजार
