पटना : कोसी इलाके में राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव इस चुनाव में अपनी जमानत भी नहीं बचा सके. शायद मधेपुरा के लोगों को उनका बड़बोलापन अच्छा नहीं लगा. यही नहीं, उनकी पत्नी रंजीत रंजन भी सुपौल से चुनाव हार गयीं. बदली राजनीति में दबंग वाली छवि को जनता ने नकार दिया.
कभी नेताओं को गोली मार देने की धमकी, तो कभी पब्लिक को ही चोर कह देने वाले बड़बाेले नेता को इस बार जनता ने इस्वीकार नहीं किया. मधेपुरा जैसे यादव हर्टलैंड में वो एक लाख वोट भी नहीं ला पाये. जबकि, सवा तीन लाख वोट पाकर पत्नी रंजीत रंजन को शिकस्त खानी पड़ी.
अजीत सरकार हत्याकांड के रहे थे अभियुक्त : कभी देश के सबसे चर्चित हत्याकांड अजीत सरकार मामले में जेल से निकलने के बाद पप्पू ने अपनी दूसरी राजनीतिक पारी की शुरुआत तो की, लेकिन अपना तरीका नहीं बदला. 2014 में सांसद बनने के बाद डॉक्टरों को खुलेआम रेट लिस्ट जारी करने का आदेश दे दिया, लेकिन भय से कोई विरोध नहीं कर पाया.
विवादों से भरा रहा है सियासी सफर
मंडलवाद की राजनीति का शुरुआती दौर में राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने अपने कैरियर की शुरुआत विधायक के तौर पर की. 1990 में सिंहेश्वर स्थान, मधेपुरा से विधानसभा का चुनाव लड़ा और चुन लिये गये.
बाद का उनका सियासी सफर आपराधिक मामलों व विवादों से भरा रहा. उन्होंने ‘जेल’ नामक अपनी किताब में खुद बताया है कि जिला स्कूल में पढ़ने के दौरान एक कपड़ा व्यवसायी को पीटने के जुर्म में पहली बार ‘जेलयात्रा’ की थी.
खुद को लालू का विकल्प बताने लगे थे पप्पू : पप्पू का मंसूबा था बिहार पर राज करने का. पिछले लोकसभा चुनाव में जीत के बाद इसकी तैयारी भी जोर-शोर से शुरू कर दी थी. पूरे राज्य में कहीं कोई घटना हो, तो पप्पू यादव हाजिर हो जाते थे.
पिछला लोकसभा चुनाव राजद के टिकट पर जीते, पर कुछ दिन बाद ही राजद सुप्रीमो के खिलाफ जंग छेड़ दी. खुद को लालू का विकल्प बताने लगे, लेकिन जब अपने चुनाव की बारी आयी तो दर-दर टिकट के लिए भटकना पड़ा. अंत समय तक यह उम्मीद थी कि कांग्रेस से उन्हें टिकट मिलेगा, पर ऐसा हुआ नहीं.
मैदान में उतरे तो हार का सामना करना पड़ा. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो पप्पू की इतनी बड़ी करारी हार के पीछे कई कारण हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुंचने वाले पप्पू यादव को इस बार महज 97631 वोट ही मिले हैं, जो कुल मतदान का 8.5 फीसदी है.
