कौशिक रंजन
नारे की जगह अब नेताओं के भाषण ने ले ली है इसकी जगह
पटना : पहले के चुनावों में नारे काफी अहमियत रखते थे, लेकिन अब नेताओं के भाषण ने इसकी जगह ले ली है. चुनावी मैदान में इनकी जगह काफी सिमट गयी है. पहले के नारों में पार्टी की तरफ से उठाये गये मुद्दे और उनकी विचारधारा साफतौर पर दिखती थी. उस समय नारे लिखने और इसे बनाने के लिए बकायदा एक बुद्धिजीवी वर्ग जुटा रहता था.
कुछ पार्टियां या नेता रामधारी सिंह दिनकर की कविता का उपयोग करते थे, तो कुछ श्रीकांत वर्मा के लिखे नारे को अपनाते थे. परंतु अब के चुनावों में ये बातें नहीं दिखती हैं. न तो किसी विचार या मांग को लेकर नारेबाजी होती है और न ही विपक्षियों पर हमला करने के लिए नारों की मदद ली जाती है. अब तो पार्टियों के नारे छोटे हो गये हैं और व्यक्ति विशेष पर आधारित हो गये हैं.
मसलन, भाजपा का नारा अबकी बार मोदी सरकार एवं मोदी है तो मुमकिन है, सीएम नीतीश कुमार पर केंद्रित जदयू का नारा, कांग्रेस का राहुल और प्रियंका को फोकस करते हुए नारे गढ़े गये हैं. सांची बात प्रियंका के साथ, मेरा वोट कांग्रेस को जैसे अन्य नारों के स्थान पर स्लग का उपयोग मुख्य रूप से हो रहा है. वामपंथी पार्टियां भी नारे को लेकर इस बार कुछ खास नहीं कर रही हैं.
कविता की लाइनों से भी गढ़े जाते थे नारे
80 के दशक में रामधारी सिंह
दिनकर की कविता से कुछ लाइनों को लेकर बनाया गया नारा, ‘दो राह समय के राथ का घर्घर नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’, जन आंदोलन की पंक्तियां बन गयी थीं. श्रीकांत वर्मा ने कांग्रेस के लिए नारा लिखा था, जात पर न पात पर, इंदिराजी की बात पर, मुहर लगाना हाथ पर. राममनोहर लोहिया ने नारा दिया था, जिंदा कौमे पांच साल इंतजार नहीं करती. मुद्दों को उठाते हुए व्यवस्था पर प्रहार करने वाले समाजवादियों के कुछ नारे काफी लोकप्रिय हुए थे.
मसलन, जमीन गयी चकबंदी में, मकान गया हथबंदी में, द्वार खड़ी औरत चिल्लाए-मरद गया नसबंदी में, रोटी कपड़ा और मकान- मांग रहा हिन्दुस्तान, महंगाई को रोक न पायी यह सरकार निकम्मी है, जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है. राम जन्म भूमि का मुद्दा आज भी भाजपा का चुनावी एजेंडा है, लेकिन इससे जुड़े नारे ‘रामलला हम आयेंगे मंदिर वहीं बनायेंगे’ नहीं दिखते हैं.
