कम्युनिस्ट पार्टियों का घटने लगा वोट, 60 से 90 के दशक तक लाल झंडे की थी मौजूदगी

पटना : देश में पहले लोकसभा चुनाव से ही कम्युनिस्ट नेताओं की भागीदारी शुरू हो गयी थी. संयुक्त बिहार में पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता मैदान में उतरे. पहले दो चुनाव में इस पार्टी को सफलता नहीं मिली. 60 से 90 के दशक में इन्होंने जीत का परचम लहराया. हालांकि, इसके बाद सफलता नहीं […]

पटना : देश में पहले लोकसभा चुनाव से ही कम्युनिस्ट नेताओं की भागीदारी शुरू हो गयी थी. संयुक्त बिहार में पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता मैदान में उतरे.
पहले दो चुनाव में इस पार्टी को सफलता नहीं मिली. 60 से 90 के दशक में इन्होंने जीत का परचम लहराया. हालांकि, इसके बाद सफलता नहीं मिली और वोट प्रतिशत में भी कमी आयी. चौथे लोकसभा चुनाव में सीपीएम व 10वें लोकसभा में भाकपा-माले ने उम्मीदवार उतारे. 2004 से 2014 तक किसी कम्युनिस्ट पार्टी को सफलता नहीं मिली.
पहले लोकसभा चुनाव में भाकपा को 0़ 39% व दूसरे में 5़ 02% वोट मिला था. तीसरे चुनाव में भाकपा को 6़ 38% वोट मिला और 16 में एक उम्मीदवार जीते. चौथे में भाकपा को 9़ 93% मत मिला और 17 में पांच उम्मीदवार जीते. सीपीएम को 0़ 31% वोट मिला और दो नेता हारे. पांचवीं लोकसभा में भाकपा को 9़ 85% वोट मिला और 17 में पांच उम्मीदवार जीते. सीपीएम का 0़ 76% मत मिला और चार नेता हारे. आपातकाल में हुए चुनाव में भाकपा व सीपीएम असफलता रहे.
1980 में भाकपा को 7़ 29% वोट मिला और 14 में चार उम्मीदवार सफल रहे. सीपीएम को 9़ 17% वोट मिला, पर तीनों उम्मीदवार हार गये. 1984 में भाकपा 8़ 24% वोट लायी और 16 में दो सीट पर जीती. सीपीएम को 1़ 05% वोट मिला. नौवीं लोकसभा में सीपीएम को 1़ 41% मत मिला और तीन में एक उम्मीदवार जीते. भाकपा को 7़ 93% वोट मिला और 12 में चार उम्मीदवार सफल रहे. 1991 के चुनाव में भाकपा सभी आठ सीट जीतने में सफल रही. 7़ 55% वोट मिला. सीपीएम के एक उम्मीदवार जीते.

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