चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को उनकी पृष्ठभूमि के बारे में मिलने लगी जानकारी
राजीव कुमार, राज्य समन्वयक एडीआर
चुनाव सुधार के इतिहास में एक एेसा युगांतकारी मोड़ आया जिसने चुनाव सुधार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया. शुरूआत एक जनहित याचिका से हुई. सबसे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गयी जिसमें आग्रह किया गया था कि संंसद और विधानसभाओं में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को उनकी पृष्ठभूमि के बारे में सार्वजनिक रूप से जानकारी देने का निर्देश दिया जाये.
नामांकन पत्र भरने के समय उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित है या नहीं यह सूचना मतदाताओं को भी उपलब्ध करायी जाये. ताकि, वह मतदान करते हुए सही फैसला ले सकें. दो नवंबर, 2001 को दिये गये अपने फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस याचिका को सही ठहराया. हालांकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस बारे में निर्वाचन आयोग को आवश्यक निर्देश जारी कर दिये थे.
इसी बीच भारत सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय के खिलाफ सर्वोच न्यायालय में एक विशेष अवकाश याचिका दायर कर दी. उच्च न्यायालय के फैसले का विरोध करते हुए कई राजनीतिक दलों ने सरकार के कदम का समर्थन किया. एडीआर ने सरकार की तरफ से दायर की गई याचिका के खिलाफ अदालत में लडाई लड़ी. सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च नयायालय के फैसले को सही ठहराया. दो मई, 2002 को सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार की याचिका को खारिज कर दिया और दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले पर मुहर लगा दी.
सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह अपने नामांकन पत्र के साथ हलफनामे के रूप में अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, अपनी आर्थिक स्थिति, पति-पत्नी एवं आश्रितों की स्थिति, देनदारी और शैक्षणिक योग्यता आदि के बारे में जानकारी दे, लेकिन सरकार ने इसके विरूद्व एक अध्यादेश लाने की तैयारी शुरू कर दी.
तब समाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई कि वे इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करें. क्योंकि यह संविधान के मूल भावना के खिलाफ है. 22 अगस्त, 2002 को राष्ट्रपति ने इसे वापिस भेज दिया. पुन मंत्रिमंडल ने दोबारा राष्ट्रपति के पास भेज दिया. इसलिए आखिरकार 24 अगस्त, 2002 को राष्ट्रपति को हस्ताक्षर करना पड़ा.
अध्यादेश में लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी देने के प्रावधान को तो रख लिया गया मगर संपत्ति एवं देनदारियों से संबंधित जानकारी वाले प्रावधान को हटा दिया गया. 18 अगस्त, 2002 को जनप्रतिनिधित्व ( संशोधन) अधिनियम 2002 के अनुच्छेद 33 बी की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सर्वोच्य न्यायालय में एक और जनहित याचिका (पीआइएल) दायर की दी गयी. यह उन तीन याचिकाओं में से थी जिनके फलस्वरूप सर्वोच्य न्यायालय ने 13 मार्च, 2003 को अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने व्यवस्था दी कि जनप्रतिनिधित्व ( संशोधन) अधिनियम असंवैधानिक निष्प्रभावी और अमान्य है.
इस तरह न्यायालय ने दो मई, 2002 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कि गये ऐतिहासिक फैसले को बहाल कर दिया. इसके साथ ही चुनाव सुधार को लेकर देश में नये अध्याय की शुरुआत हो गयी और लोगों को यह ज्ञात होने लगा कि उनके प्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि कैसी है .
