लोकसभा चुनाव 2019 : वामदल का अस्तित्व खतरे में

लाल पताका का परचम लहरानेवाले वामदलों के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव अस्तित्व बचाने से कम नहीं. 1980 के दशक में जितनी सीटों पर वामदलों के उम्मीदवार जीत कर लोकसभा पहुंचते थे. अभी स्थिति यह हो गयी है. उतनी सीटें भी महागठबंधन के लोग देने को तैयार नहीं है. 1980 में राज्य की चार, 1984 […]

लाल पताका का परचम लहरानेवाले वामदलों के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव अस्तित्व बचाने से कम नहीं. 1980 के दशक में जितनी सीटों पर वामदलों के उम्मीदवार जीत कर लोकसभा पहुंचते थे. अभी स्थिति यह हो गयी है. उतनी सीटें भी महागठबंधन के लोग देने को तैयार नहीं है. 1980 में राज्य की चार, 1984 में दो, 1989 में छह, 1991 में चार और 1996 में तीन सीटों पर जीतनेवाले वामदल की स्थिति कुछ इसी जगह आ पहुंची है.
राष्ट्रीय दलों द्वारा खाली हुए स्पेश को क्षेत्रीय दलों ने भर दिया है. इसका नतीजा है वामदल राजद से उम्मीद लगाये बैठे हैं कि तालमेल में उनके हिस्से कुछ सीटें आ जाये.
राजद भाकपा माले को आरा सीट देने पर सहमत भी दिख रही है. भाजपा के विरोध में जब महागठबंधन आकार ले रहा था, तो भाकपा माले को यह उम्मीद थी कि उनके हिस्से में आरा, सीवान, पाटलिपुत्र, जहानाबाद और काराकाट की सीटें आयेंगे. पर एनडीए को छोड़कर महागठबंधन में शामिल होने को शरद यादव, जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा व मुकेश साहनी के आने के बाद भाकपा माले से साथ कभी गंभीरता से बात ही नहीं की गयी.
अभी तक महागठबंधन की बैठकों में वामदलों के नेता भी शामिल होते रहे. भाकपा माले भी अपनी स्वतंत्र रूप से आधार वाले लोकसभा क्षेत्रों में तैयारी जारी रखे हुए हैं. भाकपा माले के अंदर यह बात चल रही है कि अगर आरा लोकसभा की सीट उनके खाते में आ जाती है तो वह सीवान व जहानाबाद में फ्रेंडली फाइट करेंगे.

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