रालोसपा प्रमुख के बयानों पर भाजपा और जदयू की चुप्पी से राजनीति हुई दिलचस्प
शशिभूषण कुंवर
पटना : एनडीए का नब्ज टटोलते-टटोलते रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की स्थिति अब एक ऐसे राजनेता की हो गयी है जिसकी खुद की राजनीतिक धड़कन कभी तेज हो जा रही, तो कभी धीमी पड़ जा रही है. अपने बयानों के कंकड़ से एनडीए की राजनीतिक पानी में लहर पैदा कर उसका आकलन करने वाले रालोसपा नेता के पास शायद ही अब राजनीति बयानों के नये पत्थर बचे हों.
आश्चर्य की बात है कि उन्होंने बयान के माध्यम से जितने कंकड़-पत्थर फेंके एनडीए की राजनीति के पानी में पूरी तरह से शांति ही बनी रही. न तो भाजपा ने और नहीं जदयू की ओर से इसकी प्रतिक्रिया दी गयी.
एनडीए की राजनीति में कोई लहर ही पैदा नहीं हुई. वहीं, उसकी गिनती करने बैठे कुशवाहा उसका इंतजार करते रह गये. उनकी स्थिति गुड़ खाये गुलगुले से परहेज जैसी बनी है. कभी यह कहते हैं कि उनको सिर्फ प्रधानमंत्री ही पद से हटा सकते है तो दूसरी ओर एनडीए की राज्य सरकार पर प्रहार कर रहे हैं. रालोसपा प्रमुख जिस सिलिंग फैन के बल पर राजनीति को हवा देने चले थे, स्थिति यहां तक पहुंच गयी कि इसकी हवा सांसद अरुण कुमार, विधायक ललन पासवान और विधायक सुधांशु शेखर को भी अपनी सेहत के लिए खराब होती दिखने लगी.
उपेंद्र कुशवाहा का राजनीति में एक के बाद एक फेंका गया कंकड़ व एनडीए का जवाब
1. शिक्षा में सुधार, मानव कतार – राजद शिवानंद तिवारी, डाॅ रामचंद्र पूर्व, तनवीर हसन, साधु यादव शमिल हुए. 30 जनवरी 2018 को. एनडीए की प्रतिक्रिया शून्य. स्व घोषित कार्यक्रम.
2. हल्ला बोल, दरवाजा खोल अभियान – न्यायालयों में गरीब सवर्णों, दलित,अल्पसंख्यकों, पिछड़ों की नियुक्ति हो. एनडीए का जवाब शून्य.
3. पैगाम-ए-खीर, यदुवंशियों का दूध, कुशवंशियों का चावल, सवर्णों की चीनी, पचपनियों का पंचमेवा, दलितों का तुलसी पत्ता और अल्पसंख्यकों का दस्तरखान. एनडीए का जवाब शून्य.
4. 28 नवंबर को ऊंच- नीच मानसिकता विरोध दिवस, शिक्षा सुधार-जन जन का अधिकार. एनडीए का जवाब शून्य.
5. प्रधानमंत्री को 30 नवंबर तक मिलने का अल्टीमेटम, दे दो केवल हमारा सम्मान, रखो सारी धरती तमाम- भाजपा खामोश.
6. जहानाबाद में तेजस्वी से की मुलाकात. एनडीए मौन.
7. शरद यादव से की मुलाकात – एनडीए भाव शून्य.
8. दो केंद्रीय विद्यालयों की स्थापना को लेकर राज्य सरकार पर आरोप, आठ को धरना पर बैठने का अल्टीमेटम. राज्य सरकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं.
अनिश्चित हो गया है उपेंद्र कुशवाहा का राजनीतिक भविष्य : सुरेंद्र किशोर
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर का मानना है कि उपेंद्र कुशवाहा द्वारा एनडीए के बीच रहकर बीच-बीच में बगावती सुर में बोलना उनके लिए चुनौतियों को बढ़ाने वाला साबित हो रहा है. रालोसपा प्रमुख के राजनीतिक दावों से उनका राजनीतिक भविष्य अनिश्चित हो गया है. इसके लिए वह खुद जिम्मेदार हैं. अब तो उनके अपने लोग भी साथ नहीं हैं.
चाहे वह विधायक हों या सांसद. इसकी वास्तविक वजह भी है. कुशवाहा सरजमीं पर अपनी जितनी ताकत बता रहे हैं उनके सांसदों और विधायक उस ताकत के प्रति आश्वस्त नहीं हैं. विधायक व सांसद यह देखते हैं कि किसके साथ रहने से चुनाव जीत जायेंगे. जो लोग कुशवाहा के साथ हैं वह अपना भविष्य उनके साथ क्यों नहीं जोड़ना चाहते. अगर उनको भरोसा होता कि कुशवाहा 10 फीसदी वोट दिलवा सकते हैं तो ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती.
