पटना : इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह के चौथे दिन देश भर से आये कलाकारों ने भारतीय नृत्य कला मंदिर में नाटक, जनगीत, लोकगीत, लोकनृत्य और कविता पाठ के जरिये ना सिर्फ अपनी संस्कृति को प्रस्तुत किया, बल्कि लोगों को जन सांस्कृतिक आंदोलन से परिचय भी कराया.
बंगाल और पंजाब से आये कलाकारों ने अपनी संस्कृति की विहंगम प्रस्तुति दी. पश्चिम बंगाल इप्टा ने रतनदीप मुखर्जी के निर्देशन में बांग्ला नाटक ई मृत्यु उपत्याका आमार देश ना मंचित हुआ. स्त्री हिंसा के बहुआयामी आयाम को निर्देशक ने काफी रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया. पंजाब इप्टा के कलाकारों ने सुषमा गांधी निर्देशित नाटक प्लेटफॉर्म को प्रस्तुत किया. डॉ पाटला के आलेख पर कलाकारों ने रेलवे प्लेटफॉर्म पर दौड़ती ज़िंदगी के विविध पहलुओं को सामने रखा. लघु नाट्य समारोह के अंत में असम इप्टा के कलाकारों ने बिहू नृत्य की प्रस्तुति की.
समारोह के चौथे दिन देश की विभिन्न लोक संस्कृतियों की गवाह भारतीय नृत्य कला मंदिर का मंच गवाह बना. असम, केरल, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार के कलाकारों के साथ विभिन्न राज्यों के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति दी. ‘तोहरे भरोसे ब्रह्म बाबा झिझिया बनवली…’ सहित कई लोकगीतों और लोकनृत्य की उम्दा प्रस्तुति से भारतीय नृत्य कला मंदिर का परिसर झूम उठा. केरल से आये कलाकारों ने ढोल, ताशे के साथ अपनी प्रस्तुति देकर खूब आनंदित किया. वहीं, असम के कलाकारों ने बिहू सहित शास्त्रीय नृत्य जरिये भगवान कृष्ण के अलग-अलग स्वरूप को प्रस्तुत कर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया.
इसके बाद वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा एवं हरिओम राजोरिया ने कविता पाठ किया. आलोक धन्वा ने ‘पुराने शहर की इस छत पर पूरे चांद की रात…’ एवं हरिओम राजोरिया ने ‘वे रोते-रोते गाने लगी, या गाते-गाते रो पड़ी..’ कविता पेश कर तालियां बटोरी. वहीं, मुंबई से आयी शीतल साठे के जनगीत ‘हर गांव के बाहर हमारी बस्ती क्यों हैं… गरीबों की जान इतनी सस्ती क्यों है…’ सुनते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित सीवान निवासी बॉलवुड अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा ने कहा कि इप्टा का काम जनता की आवाज नाटकों और गीतों से बुलंद करना है. साथ ही उन्होंने रंगमंच और इप्टा के आयोजन पर प्रकाश डाला.
