नाट्य संस्था संपूर्ण कल्याण विकास समिति की ओर से आयोजित किया गया नुक्कड़ नाटक
खगौल : नाट्य संस्था संपूर्ण कल्याण विकास समिति की ओर से रविवार को डाक बंगला परिसर में लाचार के खाए अचार पर आधारित नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किया गया. नाटक के माध्यम से सरकारी फंड की लूट खसोट को दर्शाया गया उनके प्रशांत कुमार द्वारा लिखित व ज्ञानी प्रसाद द्वारा निर्देशित नुक्कड़ नाटक ‘लाचार के खाए अचार’ ‘नाटक की शुरुआत गीत’ एक दिन तू हूं बूढ़ा होइब बबुआ,जा दिन सभे दांत टूट जाई, यह कहानी मूल रूप से बुढ़ापे के दर्द को दर्शाता है, एक वृद्धाश्रम जो बाहर से भव्य दिखता है, परंतु उसमें चले जाने के बाद सेवा की जगह वृद्धजनों की असहनीय पीड़ा व परेशानी वहां की दीवारें भी बहरी हो जाती हैं.
न ही समय पर नाश्ता, चाय, भोजन, चिकित्सा न ही मनोरंजन की सुविधा है. रहने वाले सभी वृद्धों की मानसिक दशा, शारीरिक अवस्था धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है. वृद्धाश्रम में हो रही लूट-खसोट को रेखांकित व चित्रित करते हुए कलाकारों ने अपने-अपने चरित्र को ईमानदारी पूर्वक निभाया. सूबे में सरकारी योजनाओं की स्थिति बिल्कुल दयनीय है, चरमरा-सी गयी है. सरकारी दूध की रखवाली के लिए सरकार ने ऐसी बिल्लियों को शरीक कर रखा है, जो छाली के साथ-साथ पूरा दूध ही पी जा रही है. वृद्धाश्रम में रहने वाले लाचार वृद्धों को नमक रोटी भी नसीब नहीं हो पा रही है. चिकित्सा व्यवस्था तो उनसे कोसों दूर है. वृद्धों के हिस्से की आयी सारी सुविधाएं उनके सेवा में लगे कर्मी चट कर जा रहे हैं.
नाटक में वृद्ध कलाकारों में सर्व देवगन राम, जग नारायण पंडित, कामता पासवान, नरेंद्र कुमार, विजय कुमार सिन्हा, अंबिका प्रसाद सिन्हा, सुरेश विश्वकर्मा, दीप नारायण शर्मा दीपक, ज्ञानी प्रसाद, चंद्रदेव प्रसाद, सागर कुमार, लक्ष्मण अकेला, ललित किशोर प्रणामी, प्रशांत कुमार, सुनील चौधरी, इंद्रजीत गोस्वामी, देवानंद आदि रहे.
मास्टर आदित्य कुमार, राजकुमार पासवान समेत कई लोग शामिल थे.किसी का बेटा पंद्रह दिनों के लिए बोल के छोड़ जाता है और कभी नहीं आता है. बेटे-बेटियों की आशा में ही दम तोड़ देता है.
महसूस तो होता है कि वृद्धाश्रम के अंदर के जीवन से कहीं ज्यादा अच्छा है बाहर फुटपाथ के भिखारी की जिंदगी. संस्था के महासचिव ज्ञानी प्रसाद ने दर्शकों से कहा कि हमारे देश की संस्कृति व संस्कार माता-पिता को भगवान का दर्जा देती है. वहीं, बदलते इस युग में पैसे के पीछे भागने वाले बच्चे माता-पिता को वृद्ध आश्रम के भरोसे छोड़ देते हैं. भगवान भरोसे होती है उनकी परवरिश वृद्धा आश्रम के नाम पर लूट सिर्फ लूट है. वहां व्यवस्था शून्य हैं. लाचार के अचार खाने में भी शर्म की सारे हद पार कर देते हैं.
