भविष्य में प्लास्टिक का उपयोग जारी रहा, तो हमें सांस भी खरीदनी पड़ेगी

जिले में प्रति व्यक्ति प्लास्टिक की खपत बढ़कर प्रति वर्ष हो गया 11 किलोग्राम

पर्यावरण दिवस पर खास

नागालैंड सेंट्रल यूनिवर्सिटी के विभागाध्यक्ष डॉ मिथिलेश कुमार सिन्हा ने बातचीत के आधार पर रिर्पोट

विशाल कुमार, नवादा

विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत वर्ष 1972 में हुई थी. तब से हम विश्व पर्यावरण दिवस मनाते आ रहे हैं. बावजूद इसके पर्यावरण दिन- प्रतिदिन दूषित होता जा रहा है. अगर हम अभी नहीं जागे, तो वो दिन दूर नहीं, जब हमें सांस भी खरीदनी पड़ेगी़ विश्व पर्यावरण दिवस 2025 की थीम है ””””””””प्लास्टिक प्रदूषण से निपटना”””” लेकिन, हमारे जीवन का हर पहलू प्लास्टिक पर निर्भर हो गया है. बच्चों के खिलौनों से लेकर पानी की बोतल और खाने की थाली, किचन, बाथरूम, इलेक्ट्रिक उपकरण, कार, हवाई जहाज, क्रॉकरी, फ्यूमचर, कंटेनर, बोतलें, पर्दे, दरवाजे, किवाड़, दवाइयां और बोतलों तक में इसका इस्तेमाल काफी बढ़ गया है. शरीर और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक होने के बावजूद हम प्लास्टिक का इस्तेमाल कर रहे हैं.

प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पादन का भारतीय परिप्रेक्ष्य प्लास्टिक प्रदूषण में भारत विश्व गुरु है. देशों के संदर्भ में भारत सबसे अनियंत्रित प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न करने वाला देश है, जहां विश्व के कुल अपशिष्ट का लगभग 20 प्रतिशत अर्थात 93 लाख मीट्रिक टन अपशिष्ट उत्पन्न होता है. जनवरी 2019 में केंद्र ने सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिया, फिर भी देश में प्रतिवर्ष 41.36 लाख टन प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न हो रहा है. प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पादन में लगातार वृद्धि हो रही है. वर्ष 2018-19 में यह 33.6 लाख टन था, जो 2019-20 में 34.69 लाख टन, 2020-21 में 41.26 लाख टन, 2021-22 में 39.01 लाख टन तथा 2022-23 में 41.36 लाख टन हो गया. जिले में प्रति व्यक्ति प्लास्टिक की खपत बढ़कर लगभग 11 किलोग्राम प्रति वर्ष हो गयी है, तथा बढ़ते औद्योगीकरण एवं उपभोक्तावाद के साथ इस संख्या में और वृद्धि होने की संभावना है.

प्लास्टिक कचरे के प्रभाव

हर हफ़्ते 5 ग्राम तक प्लास्टिक के कण इंसान के शरीर में जाते हैं. प्लास्टिक का कचरा माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है, जो इंसान के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है. प्लास्टिक में पाए जाने वाले रसायन, जैसे कि बिस्फेनॉल ए (BPA), एंडोक्राइन डिसरप्टिव होते हैं, जो हार्मोन को प्रभावित कर सकते हैं और प्रजनन संबंधी समस्याओं का कारण बन सकते हैं. प्लास्टिक का कचरा संक्रामक रोगों के प्रसार में भी योगदान दे सकता है. प्लास्टिक का कचरा मिट्टी और पानी को दूषित करता है़ इससे मिट्टी की उर्वरता कम होती है और जल स्रोत दूषित होते हैं. प्लास्टिक का कचरा वन्यजीवों को नुकसान पहुंचा सकता है, उन्हें फंसा सकता है या उन्हें जहरीले रसायनों के संपर्क में ला सकता है. प्लास्टिक का कचरा समुद्री जानवरों को नुकसान पहुंचाता है, जिससे वे मर सकते हैं या बीमार हो सकते हैं. प्लास्टिक प्रदूषण संतुलन को बिगाड़ सकता है. शहर व गांव की नालियां आज प्लास्टिक कचरों से भरा है.

प्लास्टिक के खतरे को कम करने के उपाय

प्लास्टिक के खतरे को कम करने के लिए पुनः उपयोग को बढ़ावा देना होगा. हमें किसी भी बेकार चीज को फेंकना नहीं चाहिए. हमें उसे फिर से इस्तेमाल करने के बारे में सोचना चाहिए. हमें धीरे- धीरे सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए. हमें ऐसी चीजें इकट्ठी करनी चाहिए जिन्हें रीसाइकिल किया जा सके और उन्हें कबाड़ में बेच देना चाहिए. प्लास्टिक का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, जिसे रीसाइकिल नहीं किया जा सकता. अगर हम घर से कोई सामान खरीदने जाएं, तो शॉपिंग बैग लेकर जाएं. हमें पेय पदार्थ पीने के लिए स्ट्रॉ का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए. हमें प्लास्टिक के डिब्बे में खाने- पीने की चीजें नहीं खरीदनी चाहिए़ इससे हम जहरीले रसायन से बच सकते हैं. हमें अपने खाने को टिफिन- बॉक्स या कांच के कंटेनर आदि में रखने की कोशिश करनी चाहिए.

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Author: PANCHDEV KUMAR

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