रवींद्र कुमार सिंह
मुजफ्फरपुर : लोकतंत्र की जननी वैशाली में जमकर मतदान (करीब 61.79 फीसदी) हुए. यहां अब तक हुए लोकसभा चुनाव के मतदान में यह सबसे ज्यादा है. रिकॉर्ड वोटिंग को महागठबंधन के डॉ रघुवंश प्रसाद सिंह व एनडीए की वीणा देवी दोनों ही अपने-अपने पक्ष में बता रहे हैं. हालांकि मुकाबला कांटे का है. यह पहला चुनाव है, जिसमें ‘कोर वोटर’ की परिभाषा टूटती दिखी.
मुस्लिम वोटरों को छोड़ दिया जाये, तो प्राय: हर जाति के वोटर में बिखराव दिखा. मुकाबला रघुवंश बनाम वीणा नहीं, मोदी नाम बनाम रघुवंश सिंह की छवि का रहा. खासकर सवर्ण वोटर इसे खुल कर स्वीकार भी कर रहे हैं. मड़वन बूथ संख्या 280 पर मतदान के लिए खड़े संजय कुमार ने पूछने पर कहा, “हम मोदिये हति”. वहीं बूथ संख्या 206 पर जब यही सवाल ब्रजेश सिंह से पूछा गया तो उनका जवाब था, “मन त मोदी के देवे के रहल ह. लेकिन रघुवंश बाबू के छवि के सामने बिहार में कोनौ न हई”. राजकीय उत्क्रमित मवि मणिफुलकाहां के बूथ संख्या 93 पर दीपक कुमार सिंह ने बताया कि “ मोदी जी को लाना जरूरी है.” पर, ऐसा नहीं है कि सभी लोगों का विचार यही है. बूथ संख्या 94 पर मतदान कर निकले राजन सिंह ने कहा, “मन में मोदी है, लेकिन रघुवंश बाबू अच्छे उम्मीदवार हैं.
राजकीय मध्य विद्यालय रेपुरा में भी इस जाति के वोटर बंटे दिखे. वैशाली में नोटा का नारा कितना चला, इस पर अलग-अलग दावे हैं. वैशाली के मतदाताओं ने इस बार मुखर होकर मतदान किया. दोनों प्रत्याशियों की् हार-जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि कुशवाहा वोटर नीतीश के साथ अधिक थे या फिर उपेंद्र कुशवाहा के साथ.
मुकेश सहनी अपने स्वजातीय वोट में कितना सेंध लगा पाये. तो इस बात पर भी नजर होगी कि जीतनराम मांझी महादलितों को महागठबंधन में कितना शिफ्ट करा पाये.
पारु, साहेबगंज और मीनापुर के नक्सलग्रस्त इलाकों में भी लोकतंत्र का जयकारा हुआ. कई बूथों पर तो सुबह-सुबह ही लाइन लग गयी. चुनाव के दौरान करीब 20 जगहों पर वीवीपैट बदलना पड़ा.
