जब श्रीबाबू के नेतृत्व में तिरंगा लेकर कलेक्ट्रेट की ओर बढ़े थे सैकड़ों क्रांतिकारी, गोरखा पुलिस से हुई थी भिड़ंत

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की गूंज मुंगेर तक पहुंची थी, जहां डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन को चुनौती दी. महद्दीपुर से तिरंगा लेकर कलेक्ट्रेट की ओर निकले जत्थे को गोरखा पुलिस ने रोका, जिससे तीखी झड़प हुई.

Munger Quit India Movement: मुंगेर. भारत छोड़ो आंदोलन का इतिहास केवल मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान तक सीमित नहीं था. 1942 में इसकी गूंज मुंगेर की गलियों तक पहुंची थी. महान स्वतंत्रता सेनानी और बाद में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बने डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में मुंगेर के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. स्वतंत्रता सेनानी राणा ऋषिदेव सिंह के अनुसार उस दौर में मुंगेर के सैकड़ों युवाओं और स्वतंत्रता सेनानियों ने आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी.

गांधी के 'करो या मरो' के आह्वान से भड़की थी क्रांति

स्वतंत्रता सेनानी राणा ऋषिदेव सिंह बताते हैं कि 8 अगस्त 1942 को मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक के दौरान महात्मा गांधी ने अंग्रेजों से भारत छोड़ने का आह्वान किया और देशवासियों को "करो या मरो" का संदेश दिया. इस आह्वान के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में आंदोलन तेज हो गया.मुंगेर में भी क्रांतिकारियों के भीतर आजादी की लौ और तेज हो गई. आंदोलनकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने का फैसला किया और डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में तिरंगा लेकर सड़कों पर उतर पड़े.

महद्दीपुर से तिरंगा लेकर कलेक्ट्रेट की ओर निकला था जत्था

राणा ऋषिदेव सिंह के मुताबिक डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारियों का जत्था मुंगेर शहर के मध्य विद्यालय महद्दीपुर से तिरंगा लेकर निकला था. उस समय श्रीबाबू ने घोषणा की थी कि तिरंगा मुंगेर कलेक्ट्रेट पर फहराया जाएगा.इस खबर की जानकारी अंग्रेजी प्रशासन तक भी पहुंच गई थी. लिहाजा प्रशासन ने क्रांतिकारियों को रोकने के लिए रास्ते में पुलिस बल तैनात कर दिया.

मकससपुर मस्जिद के पास गोरखा पुलिस ने रोका रास्ता

तिरंगा लेकर सैकड़ों लोग आगे बढ़े तो खनका मोड़ से पहले मकससपुर मस्जिद के समीप गोरखा पुलिस ने उनका रास्ता रोक दिया. इसके बाद स्वतंत्रता सेनानियों और पुलिस के बीच तीखी झड़प हो गई.राणा ऋषिदेव सिंह के अनुसार पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज शुरू कर दिया, जिसके जवाब में क्रांतिकारियों ने भी पथराव किया. देखते ही देखते स्थिति तनावपूर्ण हो गई और प्रशासन ने आंदोलनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया.

फोटो- स्वतंत्रता सेनानी राणा ऋषिदेव सिंह | Prabhat Khabar Network

श्रीबाबू गिरफ्तार, कई क्रांतिकारी हुए घायल

आंदोलन के दौरान अंग्रेजी पुलिस ने डॉ. श्रीकृष्ण सिंह को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस कार्रवाई में कई स्वतंत्रता सेनानी घायल हुए. इनमें महद्दीपुर निवासी धर्मवीर सिंह भी शामिल थे, जिनके सिर में गंभीर चोट लगी थी.यह घटना मुंगेर में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनता के आक्रोश और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गई.

घर-घर पहुंचा अंग्रेजी पुलिस का दबाव

राणा ऋषिदेव सिंह बताते हैं कि आंदोलन के बाद अंग्रेजी पुलिस का बलूचिया दस्ता क्रांतिकारियों के घरों तक पहुंचने लगा. परिवारों को परेशान किया जाता था और आंदोलनकारियों को पकड़ने की कोशिश होती थी.कई स्वतंत्रता सेनानी अपने मित्रों और रिश्तेदारों के घरों में छिपकर रहे. इसके बावजूद आंदोलन की गतिविधियां पूरी तरह बंद नहीं हुईं.

जेल से निकलने के बाद फिर शुरू हुई गुप्त बैठकें

डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के जेल से मुक्त होने के बाद आंदोलन को फिर से संगठित किया गया. अलग-अलग स्थानों पर गुप्त बैठकें होने लगीं और क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अभियान जारी रखा.राणा ऋषिदेव सिंह के अनुसार मुंगेर के सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानी इस संघर्ष से जुड़े रहे और 1947 में देश की आजादी तक अलग-अलग स्तर पर आंदोलन में सक्रिय रहे.

सूर्यगढ़ा थाना भी क्रांतिकारियों के निशाने पर रहा

स्वतंत्रता सेनानी बताते हैं कि उसी दौर में तत्कालीन मुंगेर जिले के सूर्यगढ़ा थाना को भी क्रांतिकारियों ने आग के हवाले कर दिया था. उस समय आंदोलनकारियों का उद्देश्य स्पष्ट था - अंग्रेजी शासन को समाप्त करना और देश को स्वतंत्र कराना.

आजादी के लिए हंसते-हंसते आंदोलन में कूद पड़ते थे लोग

Munger Quit India Movement: राणा ऋषिदेव सिंह कहते हैं कि उस दौर में स्वतंत्रता सेनानियों के सामने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से बड़ा लक्ष्य देश की आजादी था. कांग्रेस नेतृत्व की ओर से जब भी आंदोलन का आह्वान होता, मुंगेर के लोग बड़ी संख्या में उसमें शामिल हो जाते थे.आजादी के उन संघर्षों की यादें बताती हैं कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक परिवर्तन का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे हजारों गुमनाम और समर्पित लोगों का त्याग, संघर्ष और साहस भी जुड़ा हुआ था.


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लेखक के बारे में

By राणा गौरी शंकर

राणा गौरी शंकर प्रिंट माध्यम में 32 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत दैनिक आज से की. अभी प्रभात खबर के मुंगेर कार्यालय में कार्यरत हैं. सामाजिक सरोकार, अपराध, शिक्षा, राजनीतिक खबरों में रुचि रखते हैं.

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