Literary Event : शीतला मंदिर-जिला स्कूल रोड स्थित अध्ययन कक्ष में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार मधुसूदन आत्मीय ने की. उन्होंने मुंशी प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद से जुड़ा एक रोचक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि वाराणसी की दालमंडी में साहित्यकारों की नियमित गोष्ठियां होती थीं. इसी दौरान प्रेमचंद के आग्रह पर जयशंकर प्रसाद ने अपना चर्चित उपन्यास ‘कंकाल’ प्रस्तुत किया था, जिसकी तुलना प्रेमचंद ने अपने उपन्यास ‘सेवासदन’ से की थी.
मानवीय संवेदनाओं के कथाकार थे प्रेमचंद
प्रो. प्रेम विनय ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास अभावग्रस्त समाज, सामाजिक विषमता और मानवीय संवेदनाओं का सजीव चित्रण करते हैं. हीरो राजन कुमार ने उन्हें गरीबों और वंचितों का सच्चा साहित्यकार बताते हुए युवाओं से उनके आदर्शों पर चलने का आह्वान किया. कवि विजय बरतानिया ने प्रेमचंद को न्यायप्रियता और सामाजिक चेतना का महान कथाकार बताया.
रफी के गीतों ने बांधा समां
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में विश्व प्रसिद्ध पार्श्व गायक मोहम्मद रफी को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई. अताउल्लाह मुफ्ती ने भारतीय सिनेमा में मुस्लिम संगीतकारों और गीतकारों के योगदान पर प्रकाश डाला. चर्चित गायक निर्मल सक्सेना ने ‘दिल का सूना साज तराना ढूंढेगा’ सहित कई गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं की खूब सराहना बटोरी.
सदाबहार गीतों से भावुक हुए श्रोता
अभिमन्यु मेहता ने ‘तुम मुझे यूं भुला न पाओगे’ गीत प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया. वहीं कल्पश्विनी और विजय बरतानिया ने भी अपनी मधुर प्रस्तुतियों से कार्यक्रम को यादगार बना दिया. साहित्य और संगीत के इस संगम ने उपस्थित लोगों को प्रेमचंद और मोहम्मद रफी की अमर विरासत से एक बार फिर रूबरू कराया.
