पशु औषधालय में न कंपाउंडर व न ड्रेसर, भगवान भरोसे बीमार पशुओं का इलाज

पशु औषधालय में न कंपाउंडर व न ड्रेसर, भगवान भरोसे बीमार पशुओं का इलाज

मुंगेर. जिला पशु औषधायल ऐसा अस्पताल है, जहां न तो कंपाउंडर है और न ड्रेसर. हद तो यह है कि यहां चिकित्सकों की भी कमी है. यहां बीमार पशुओं का इलाज भगवान भरोसे है. जिसके कारण अधिकांश पशुपालक आज भी झोलाछाप पशु चिकित्सकों के भरोसे अपने पशुओं का इलाज कराने को मजबूर हैं.

न कंपाउंडर ही ड्रेसर, पशुपालक परेशान

जिला मुख्यालय में भगत सिंह चौक पर अवस्थित है जिला पशु औषधालय. जो मैन पावर और संसाधन की कमी से जूझ रहा है. यहां तीन चिकित्सकों का पद स्वीकृत है. लेकिन मात्र दो चिकित्सक ही तैनात हैं. जिसके कारण भ्रमणशील पशु चिकित्सकों की मदद रोस्टर के अनुसार लिया जाता है. यहां न तो कंपाउंडर है और न ही ड्रेसर है. जिसके कारण घाव-घोष वाले पशुओं को सिर्फ दवा लिख कर छोड़ दिया जाता है. मरहम-पट्टी के लिए पशुपालकों को बाहर के भरोसे रहना पड़ रहा है. जिससे मानसिक और आर्थिक परेशानी उठानी पड़ रही है. इतना ही नहीं पशुधन सहायक भी इस अस्पताल में नहीं है. जिसके कारण गर्भाधान, सुई लगाने की भी व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित होती है. अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार यहां संसाधनों का भी घोर अभाव है. विदित हो कि वर्ष 2017 के पहले जिला पशु अस्पताल सुबह 10 बजे से शाम के 4 बजे तक ही चलता है. जबकि अभी यह अस्पताल रविवार को छोड़ कर 24 घंटे संचालित होता है. बावजूद 2017 के पहले वाले स्वीकृत पद की व्यवस्था अब भी बहाल है.

स्वीपर नहीं रहने से सफाई व्यवस्था हो रही प्रभावित

बताया जाता है कि यहां स्वीपर की पोस्टिंग नहीं है. जिसके कारण सफाई व्यवस्था यहां बुरी तरह प्रभावित हो रही है. अस्पताल कर्मियों की मानें तो यहां गाय, भैंस, कुत्ता, बिल्ली, बकरी लेकर लोग इलाज कराने आते हैं. अगर पशु यहां शौच व पैखाना कर तो उसकी सफाई बुरी तरह से प्रभावित हो जाती है. सुबह में जब जिला पशु पालन विभाग में सफाई करने सफाईकर्मी आते हैं तो उसी से आरजू-मिन्नत कर सफाई कराई जाती है. वहां इलाज कर रहे पशु चिकित्सकों की मानें तो सफाईकर्मी की तैनाती यहां होनी चाहिए.

ऑपरेशन की नहीं है यहां कोई व्यवस्था

जिला पशु अस्पताल में ऑपरेशन और सर्जरी की उचित सुविधा नहीं है. डॉक्टर की कमी और उपकरणों के अभाव के कारण गंभीर रूप से बीमार पशुओं का इलाज नहीं हो पाता है, जिससे उनकी जान जोखिम में पड़ जाती है. इस स्थिति में पशुपालकों को निजी पशु क्लीनिकों और झोला छाप पशु चिकित्सक पर निर्भर रहना पड़ता है. कुत्ता और बिल्ली को उसके मालिक अपनी व्यवस्था से विशेष परिस्थिति में इलाज के लिए बाहर ले जाते हैं.

कहते हैं पशु शल्य चिकित्सक

पशु शल्य चिकित्सक डॉ सत्यनारायण यादव ने बताया कि मैन पावर की यहां कमी है. जिसको लेकर विभाग को लिखा गया है. यहां महीने में 1500 से 2000 पशुओं का इलाज होता है. सर्जरी की व्यवस्था नहीं है. वैसी परिस्थिति में पशुओं को रेफर पटना कर दिया जाता है.

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By BIRENDRA KUMAR SING

BIRENDRA KUMAR SING is a contributor at Prabhat Khabar.

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