बरसात में गांव का संपर्क टूट जाता है, बीमारों को खाट पर उठाकर सात किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक ले जाने को मजबूर हैं ग्रामीण
हवेली खड़गपुर (मुंगेर) से रतन झा की रिपोर्ट:
Munger Village Development Crisis: एक ओर देश आजादी के 79वें वर्ष के अवसर पर विकास और अमृतकाल की उपलब्धियों का जश्न मना रहा है, वहीं दूसरी ओर मुंगेर जिले के हवेली खड़गपुर अनुमंडल का छोटकी फुलवरिया गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बदहाल जीवन जीने को मजबूर है. लगभग दो हजार की आबादी वाला यह महादलित और आदिवासी बहुल गांव आज भी सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है.
रामनकाबाद पश्चिमी पंचायत अंतर्गत स्थित छोटकी फुलवरिया गांव पहाड़ी क्षेत्र में बसा हुआ है. ग्रामीणों का आरोप है कि आजादी के दशकों बाद भी गांव को विकास की मुख्यधारा से नहीं जोड़ा जा सका है. गांव तक पहुंचने के लिए आज भी कच्चे और जर्जर रास्तों का सहारा लेना पड़ता है.
बारिश में कट जाता है गांव का संपर्क
ग्रामीणों के अनुसार बरसात के दिनों में गांव की स्थिति और भी गंभीर हो जाती है. कच्चे रास्तों पर कीचड़ और जलजमाव के कारण गांव का संपर्क आसपास के इलाकों से लगभग टूट जाता है. सड़क नहीं होने से आवागमन मुश्किल हो जाता है और लोगों को दैनिक जरूरतों के लिए भी भारी परेशानी उठानी पड़ती है.
मरीजों और गर्भवती महिलाओं के लिए बढ़ जाती है मुश्किल
ग्रामीणों ने बताया कि किसी के बीमार पड़ने पर मरीज को खाट या कंधे पर उठाकर करीब सात किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक पहुंचाना पड़ता है. इसके बाद ही उसे अस्पताल ले जाया जा सकता है. सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती.
ग्रामीण महिला मंगली देवी ने बताया कि सड़क के अभाव में कई गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका. उनका कहना है कि यदि गांव मुख्य सड़क से जुड़ जाए तो लोगों की कई समस्याएं स्वतः दूर हो जाएंगी.
हमलोगों की मांग है कि जल्द से जल्द गांव को मुख्य सड़क से जोड़ा जाए. विकास की बात तो होती है, लेकिन हमारे गांव तक उसका लाभ नहीं पहुंच पाया है.” — मंगली देवी, ग्रामीण
शिक्षा और पेयजल की भी गंभीर समस्या
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में आंगनबाड़ी केंद्र भवन नहीं है, जिससे छोटे बच्चों की शिक्षा और पोषण सेवाएं प्रभावित होती हैं. वहीं पेयजल की समुचित व्यवस्था भी नहीं है. महिलाओं को दूरस्थ जलस्रोतों से पानी लाना पड़ता है.
लक्ष्मी सोरेन ने बताया कि गांव में सड़क, शिक्षा और पानी की समस्या वर्षों से बनी हुई है. वहीं सुनीता सोरेन ने कहा कि शौचालय की सुविधा नहीं होने के कारण लोगों को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है.
समुदाय भवन बना, लेकिन सुविधाएं नहीं
ग्रामीणों के अनुसार बिहार महादलित विकास मिशन के तहत करीब तीन वर्ष पूर्व गांव में एक समुदाय भवन का निर्माण कराया गया था. हालांकि भवन में पेयजल, बिजली और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य पूरा दिखाकर राशि की निकासी कर ली गई, लेकिन सुविधाएं आज भी अधूरी हैं.
पंचायत की उपेक्षा का आरोप
सामाजिक कार्यकर्ता अजय कुमार अजय ने आरोप लगाया कि पंचायत के इस महादलित और आदिवासी बहुल क्षेत्र को लगातार नजरअंदाज किया गया है. उन्होंने कहा कि गांव की समस्याओं को लेकर जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और जिला प्रशासन को कई बार आवेदन दिया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई.
“सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस तक गांव में नहीं पहुंच पाती. हमारी मांग है कि छोटकी फुलवरिया को मुख्य सड़क से जोड़ा जाए, ताकि गांव भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सके.” — अजय कुमार अजय, सामाजिक कार्यकर्ता
चुनावी वादों तक सीमित रह गई उम्मीदें
वार्ड सचिव मोहित हसदा ने बताया कि चुनाव के दौरान सड़क निर्माण और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही सभी वादे हवा हो जाते हैं.
“गर्मी में धूल और बरसात में कीचड़ हमारी नियति बन गई है. सरकार जल्द सड़क निर्माण कराए, ताकि गांव का संपर्क शहर और मुख्य मार्गों से हो सके.” — मोहित हसदा, वार्ड सचिव
प्रशासनिक पहल का इंतजार
छोटकी फुलवरिया की स्थिति केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े करती है. आज भी यहां के लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन उनकी समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देगा और जल्द समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाएगा.
