संन्यास गेरुआ वस्त्र नहीं, सेवा और समर्पण का संकल्प है: स्वामी निरंजनानंद

योग पीठ के परमाचार्य स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने स्पष्ट किया कि गेरुआ वस्त्र संन्यास की पहचान नहीं, बल्कि व्यक्ति का आचरण, समर्पण और सेवा भाव ही उसकी कसौटी है. सच्चा संन्यासी वही है जो गुरु के संकल्प और मानवता के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दे.

मुंगेर. पादुका दर्शन स्थित संन्यास पीठ में शनिवार को लक्ष्मीनारायण महायज्ञ की पूर्णाहुति के साथ संन्यास दिवस समारोह संपन्न हुआ. समारोह को संबोधित करते हुए योग पीठ के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि गेरुआ वस्त्र संन्यास की पहचान हो सकता है, लेकिन उसकी कसौटी नहीं है. संन्यास की सार्थकता व्यक्ति के आचरण, समर्पण और सेवा भाव से होती है.

गुरु के संकल्प और मानवता के कल्याण को जीवन समर्पित करना ही संन्यास

स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि सच्चा संन्यासी वही है, जो अपने छोटे ‘मैं’ से ऊपर उठकर गुरु के संकल्प और मानवता के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दे. उन्होंने कहा कि परमगुरु परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने संन्यास के इसी मर्म को अपने जीवन में उतारा.

उन्होंने बताया कि 12 सितंबर को ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद सरस्वती से संन्यास की दीक्षा लेने के बाद स्वामी सत्यानंद के जीवन को नयी दिशा मिली. यह केवल बाहरी रूपांतरण नहीं था, बल्कि चेतना, उद्देश्य और जीवन-दृष्टि का पुनर्जन्म था. संन्यास संसार से पलायन नहीं, बल्कि व्यापक समाज के प्रति समर्पण का मार्ग है.

गुरु की आज्ञा और उपदेश को जीवन में उतारना ही संन्यास

स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि सिर मुंडा लेने और गेरुआ वस्त्र धारण कर लेने मात्र से कोई संन्यासी नहीं बन जाता. संन्यास का वास्तविक अर्थ गुरु की आज्ञा और उपदेश को जीवन में उतारना है.

उन्होंने कहा कि स्वामी सत्यानंद ने जन्म से मिले नाम, परिचय और पारिवारिक पहचान से आगे बढ़कर गुरु की आज्ञा को अपने जीवन का आधार बनाया. योग, साधना, सेवा और मानव कल्याण को उन्होंने जीवन का उद्देश्य बनाया.

संन्यास-दीक्षा जीवन को नया उद्देश्य देने वाला संस्कार

उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में संस्कार को मनुष्य के दूसरे जन्म का आधार माना गया है. संन्यास-दीक्षा भी स्वामी सत्यानंद के जीवन में ऐसा ही संस्कार बनी, जिसने उनके जीवन को नया उद्देश्य दिया और उन्हें व्यापक मानव कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाया.

दूसरों के लिए जीने वाले ईश्वर के दूत होते हैं

स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि कुछ लोग अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीते हैं. ऐसे लोग ईश्वर के दूत होते हैं. स्वामी सत्यानंद भी ऐसे ही व्यक्तित्व थे.

उन्होंने स्पष्ट किया कि गेरुआ वस्त्र और मुंडन संन्यास की बाहरी पहचान हैं, जबकि सेवा, समर्पण, सदाचार और गुरु के मिशन को आगे बढ़ाना उसके वास्तविक आधार हैं.

उपस्थित श्रद्धालु | Prabhat Khabar Network

गुरु शिष्य के अहंकार और नकारात्मकता को दूर करता है

स्वामी निरंजनानंद ने परमहंस रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि गुरु अपने उत्तराधिकारी का चयन उसकी पात्रता देखकर करते हैं. गुरु केवल प्रशंसा करने वाला नहीं होता, बल्कि शिष्य के भीतर के अहंकार और नकारात्मकता को दूर करने का कार्य करता है.

उन्होंने कहा कि गुरु की डांट भी शिष्य को बेहतर बनाने का माध्यम होती है. गुरु के प्रति श्रद्धा, प्रेम और समर्पण साधना की अनिवार्य शर्तें हैं.

सामूहिक नारायण मंत्र से भक्तिमय हुआ संन्यास पीठ परिसर

लक्ष्मीनारायण महायज्ञ के पांचवें दिन पादुका दर्शन परिसर में साधकों और श्रद्धालुओं ने ‘ॐ नमो नारायणाय’ का 108 बार सामूहिक पाठ किया. इसके साथ महालक्ष्मी अष्टकम, नारायण स्तुति और सद्गुरु गायत्री का पाठ किया गया. गुरु-वंदना के दौरान स्वामी सत्यानंद की साधना-यात्रा और स्वामी शिवानंद से मिली दीक्षा का स्मरण किया गया. कार्यक्रम के अंत में ‘बोलो जय सत्यानंद’ और ‘गुरुवर सत्यानंद, जीवन बने योग गीत’ की प्रस्तुति हुई.

साधना, सेवा और मानव कल्याण का संदेश

सामूहिक गुरु-स्मरण के साथ समारोह संपन्न हुआ. लक्ष्मीनारायण महायज्ञ की पूर्णाहुति और संन्यास दिवस समारोह में साधना, सेवा, समर्पण और मानव कल्याण का संदेश प्रमुख रहा.

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By Birendra Kumar Sing

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