बाढ़, बारिश और बर्बादी, यही है बेबस पीड़ितों की पूरी कहानी

नीचे पानी, ऊपर से बारिश, बीच में झूल रही जिंदगानी वाली स्थिति में हैं बाढ़ पीड़ित

बाढ़ के बीच घिरे लोगों के लिए 10 किलोमीटर दूर सामुदायिक किचन में बन रहा भोजन, प्रशासनिक व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

मुंगेर. शासन और प्रशासन ने गंगा के जलस्तर में गिरावट के बाद तय कर लिया है कि बाढ़ की विभीषिका टल गयी है, लेकिन बाढ़ पीड़ितों की समस्या कम होने के बजाय और जटिल हो गयी है. बाढ़, बारिश और बर्बादी का यह मंजर ही वर्तमान में बेबस बाढ़ पीड़ितों की पूरी कहानी है, जिसमें घर, फसलें और खाने-पीने की चीजें तबाह हो गयी हैं. लोग बेघर हो गये हैं. कुछ राहत शिविर में शरण लिये हुए हैं, तो अधिकांश अब भी बाढ़ के बीच गांव में फंसे हुए हैं. इनकी आंखें राहत के इंतजार में पथरा गयी हैं.

बारिश ने बढ़ायी पीड़ितों की परेशानी

बाढ़ के बीच हो रही बारिश ने बाढ़ पीड़ितों की परेशानी बढ़ा दी है. बाढ़ के कारण लोग घर से बेघर होकर सड़क, पार्क, गंगा घाट और राहत शिविर में शरण लिये हुए हैं. इनके समक्ष एक नयी परेशानी बारिश ने उत्पन्न कर दी है. शहर के बबुआ घाट और समाहरणालय के सामने पार्क में 50 से अधिक परिवार पॉलीथिन शीट्स के नीचे किसी तरह गुजर-बसर कर रहे थे. 12 तक बारिश नहीं हुई थी, तो बाढ़ प्रभावित होने के बावजूद किसी तरह जिंदगी कट रही थी, लेकिन बुधवार की सुबह हुई मूसलाधार बारिश के बाद लगातार रूक-रूक कर हो रही बारिश ने उनकी परेशानी काफी बढ़ा दी है. एक ही पॉलीथिन से बने तंबू में बाल-बच्चों के साथ पूरा परिवार सिर छिपाये हुए है. वहीं दूसरी ओर घरेलू समान, मवेशियों का चारा और बकरी-मेमना को बारिश से बचाने के लिए उसी में रखे हुए है.

10 किलोमीटर दूर बन रहा भोजन, कैसे जाएंगे खाने

बाढ़ के कारण दियारा क्षेत्र के बाढ़ प्रभावित कुतलुपुर, जाफरनगर, टीकारामपुर पूरी तरह से जलमग्न हैं. कुछ परिवारों ने तो घर छोड़ राहत शिविर पहुंच कर शरण ले ली है, लेकिन अधिकांश परिवार आज भी बाढ़ के बीच गांव में ही हैं. बाढ़ के बीच ऐसे लोग अपने घरों के छत, मचान और ऊंचे स्थान पर थे, लेकिन बारिश ने उनकी परेशानी को और अधिक जटिल कर दिया. दियारा क्षेत्र के गांव में रुके ग्रामीणों का हालत यह है कि नीचे पानी और ऊपर से बारिश, बीच में झूल रही जिंदगानी वाली स्थिति उत्पन्न हो गयी है. हद तो यह है कि कुतलुपुर के बाढ़ पीड़ितों को पका हुआ भोजन उपलब्ध कराने के लिए जिस सामुदायिक रसोई से टैग किया गया है. वह कुतलुपुर से 10 किलोमीटर दूर बेगूसराय जिले के पचवीर में है. जहां दो वक्त का खाना खाने जाना इन बाढ़ पीड़ितों के लिए खतरों से खाली नहीं है. कुतलुपुर निवासी दिनेश सिंह, राजीव चौधरी, ललन पाठक ने बताया कि कुतलुपुर वार्ड-13 में सामुदायिक भवन है, जो ऊंचे स्थान पर है. वहां सामुदायिक रसोई बनायी जाती है तो सभी को पका हुआ भोजन मिलता. 10 किलोमीटर दूर जाना मुश्किल है. लोग वहां भोजन करने नहीं जाते हैं. प्रशासनिक स्तर पर सामुदायिक भवन में रसोई का संचालन कराया जाये अथवा बाढ़ पीड़ितों को सूखा राशन उपलब्ध कराया जाये.

खतरे के निशान से अब भी 10 सेंटीमीटर ऊपर बह रही गंगा, घटने का सिलसिला रुका

मुंगेर. जिले में अभी भी गंगा खतरे के निशान 39.33 मीटर से 10 सेंटीमीटर ऊपर बह रही है. इसके कारण बाढ़ पीड़ित त्राहिमाम कर रहे हैं. आपदा विभाग से मिली जानकारी के अनुसार गंगा के जलस्तर में बुधवार की सुबह 10 बजे तक गिरावट दर्ज की गयी थी. उस समय गंगा का जलस्तर 39.44 पर था, लेकिन सुबह 11 बजे के बाद गंगा का जलस्तर कम होना बंद हो गया और वह पूरी तरह से 39.43 पर स्थिर हो गया. शाम 6 बजे तक गंगा का जलस्तर पूरी तरह से 39.43 पर ही स्थिर था.

बाढ़ के पानी में नहीं करें क्रीड़ा, खतरे में पड़ सकती है जान

मुंगेर. बाढ़ भले ही लोगों के लिए अभिशाप बनी हुई है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह जलक्रीड़ा करने का एक माध्यम बन गयी है. विदित हो कि बाढ़ के पानी में डूबने से इस सीजन में आधे दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन कुछ लोग बाढ़ के पानी से मनोरंजन कर रहे हैं. बुधवार को प्रभात खबर की टीम जब हेरूदियारा विद्यालय के समीप पहुंची तो कुछ लोग वहां पर ऑटो की सफाई के साथ ही बाढ़ के पानी में स्नान करने के साथ आनंद उठा रहे थे. जबकि सड़क के सटे ही बड़ा गड्ढा है और उसमें बाढ़ का पानी भरा हुआ है. इतना ही नहीं वहां पर चारों ओर फैले बाढ़ के पानी में दो युवक हवा भरे बड़े ट्यूब पर बैठ कर बाढ़ के पानी में कूद-कूद कर स्नान का मजा ले रहे थे. चारों ओर बाढ़ का पानी फैला हुआ है और यह जलक्रीड़ा उनके जान को खतरे में डाल सकती है. प्रभात खबर अपील करता है, बाढ़ के पानी में जाने से बचे. जरूरत पड़ने पर प्रशासनिक मदद के सहारे गांव से निकलें, बच्चों को भी घरों में सुरक्षित रखें.

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Published by: Birendra kumar sing

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