पादुका दर्शन में मंगलवार को वैदिक मंत्रोच्चार, गुरु-स्मरण और संकीर्तन के बीच 16वें लक्ष्मीनारायण महायज्ञ का शुभारंभ हुआ. यज्ञ के आरंभ के साथ ही पूरा परिसर आध्यात्मिक वातावरण में डूब गया. साधकों और श्रद्धालुओं ने सामूहिक संकीर्तन एवं मंत्रपाठ के माध्यम से गुरु परंपरा का स्मरण किया. इस अवसर पर बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने यज्ञ के आध्यात्मिक महत्व और गुरु परंपरा की शिक्षाओं पर प्रकाश डाला.
दो महान आचार्यों के स्मरण से जुड़ा है यज्ञ
परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि मंगलवार का दिन अत्यंत पावन है. यह दादा गुरु स्वामी शिवानंद सरस्वती का जन्मदिवस है और इसी शुभ अवसर पर लक्ष्मीनारायण यज्ञ का आरंभ हो रहा है. उन्होंने बताया कि यज्ञ की पूर्णाहुति परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के जन्मदिन पर होगी. इस प्रकार यज्ञ की साधना गुरु परंपरा के दो महान आचार्यों के स्मरण से जुड़ी हुई है.
उन्होंने कहा कि स्वामी शिवानंद के जीवन के दो प्रमुख आधार प्रेम और सेवा थे. उनका प्रेम आसक्ति और अपेक्षा से मुक्त था, जबकि उनकी सेवा निःस्वार्थ भाव पर आधारित थी. आध्यात्मिक साधना केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पीड़ित मानवता और समाज के प्रति संवेदना एवं सेवा भी उसका अभिन्न हिस्सा है.
बाहरी कर्मकांड नहीं, अंतःकरण का शुद्धिकरण है भक्ति
स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि भक्ति को केवल पूजा-पाठ और बाहरी कर्मकांड तक सीमित नहीं किया जा सकता. भक्ति का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के अंतःकरण को निर्मल करना और भावनाओं को संतुलित बनाना है. काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी प्रवृत्तियों के असंतुलन से मन अशांत होता है. भक्ति इन विकारों को कम कर मन को स्थिर और शांत बनाने की साधना है.
यज्ञ के दौरान ‘ॐ नमो नारायणाय’ और ‘ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ का 108-108 बार जाप किया गया. गुरु मंत्र, संकीर्तन और सद्गुरु गायत्री के पाठ से वातावरण भक्तिमय बना रहा. साधकों और श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से मंत्रोच्चार कर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया.
प्रेम, सेवा और आत्मसाक्षात्कार का संदेश
इस अवसर पर स्वामी शिवानंद के प्रसिद्ध संदेश ‘सेवा करो, प्रेम करो, दान दो, शुद्ध बनो, अच्छे बनो, अच्छा करो, ध्यान करो और आत्मसाक्षात्कार करो’ को जीवन में उतारने का आह्वान किया गया. इन सूत्रों में सेवा, भक्ति, ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग निहित है.
यज्ञ को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और लोकमंगल की साधना के रूप में प्रस्तुत किया गया. यज्ञ की अग्नि में आहुति के साथ अपने भीतर के अहंकार, द्वेष और अशांति को त्यागने का संकल्प लेने पर जोर दिया गया.
2011 में शुरू हुई थी यज्ञ की परंपरा
पादुका दर्शन में लक्ष्मीनारायण यज्ञ की परंपरा वर्ष 2011 में शुरू हुई थी. तब से यह आयोजन निरंतर होता आ रहा है. इस वर्ष आयोजित महायज्ञ इस परंपरा का 16वां आयोजन है. यज्ञ को माता लक्ष्मी और भगवान नारायण की कृपा के साथ-साथ शांति, शुभता, आध्यात्मिक चेतना और लोकमंगल का प्रतीक माना जाता है.
स्वामी शिवानंद की प्रेम और सेवा की विरासत यह संदेश देती है कि आध्यात्मिकता जीवन से अलग नहीं, बल्कि जीवन को अधिक शुद्ध, संवेदनशील और सार्थक बनाने की साधना है. इसी भावना के साथ पादुका दर्शन में महायज्ञ का शुभारंभ श्रद्धा और आध्यात्मिक उत्साह के बीच हुआ.
