यक्ष्मा पर प्रत्येक साल करोड़ों रुपये खर्च करती है़ बावजूद मरीजों की मौत हो तो कहीं न कहीं स्वास्थ्य विभाग के व्यवस्थाओं में दोष है़ मरीजों के देख भाल में लगे स्वास्थ्य कर्मी तथा विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाएं या तो अपनी जिम्मेदारी शत-प्रतिशत नहीं निभा पा रही. मरीजों की मॉनीटरिंग नहीं होती. इसी का परिणाम है कि इस अबतक यक्ष्मा के 44 रोगियों की जान जा चुकी है.
मुंगेर : यूं तो प्रत्येक साल जिले में यक्ष्मा रोग से लगभग 1200-1500 मरीज ग्रसित होते हैं. किंतु वर्ष 2015 में जिले भर में यक्ष्मा के कुल 1356 मरीज पाये गये़ जिसकी पहचान कर उन्हें डॉट्स देना आरंभ किया गया़
नियमित दवा के सेवन से कुल 1242 मरीज तो स्वस्थ्य हुए, किंतु पूर्ण देख-भाल तथा सही मॉनीटरिंग नहीं हो पाने के कारण 114 लोगों ने बीच में ही दवा छोड़ दी़ जिसका दुष्परिणाम है कि 44 लोगों की मौत हो गयी जो स्वास्थ्य विभाग के लिए चिंता का विषय है.
शहरी क्षेत्र के लोग अधिक प्रभावित : ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक शहरी क्षेत्र के लोग यक्ष्मा रोग से प्रभावित हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछलेर्ग्ष यहां यक्ष्मा के कुल 280 मरीज पाये गये़ जो जिले भर में सभी प्रखंडों से अधिक है़ बांकी प्रखंडों में यह आंकड़ा दो अंकों तक ही सीमित रह गया़ शहरी क्षेत्र की यदि बात की जाये तो यहां अत्यधिक स्लम बस्ती में रहने वाले लोग यक्ष्मा के शिकार होते हैं. वहीं जानकारों की मानें तो शहरी क्षेत्र में यक्ष्मा को बढ़ावा देने में व्याप्त गंदगी तथा फैक्ट्रियों से निकलने वाला विषैला धुंआ है़ जो हर साल सैकड़ों लोगों को बीमार कर रहा है़
करोड़ों खर्च के बावजूद हो रही चूक : विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा सरकार द्वारा प्रत्येक साल यक्ष्मा पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है.
बावजूद मरीजों के इलाज में चूक रह जाती है़ नतीजतन दर्जनों मरीज का इलाज अधूरा रह जाता है और रोगियों की मौत हो जाती है. बांकी का इलाज फिर से एमडीआर विधि द्वारा करना पड़ता है़ मरीजों के इलाज में चूक होने का मुख्य कारण स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा मरीजों की सही से निगरानी नहीं करने तथा वरीय पदाधिकारियों द्वारा नियमित रूप से मॉनेटरिंग नहीं हो पाना़ इसके अलावे कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी हैं, जो कागजों पर अपने कर्तव्य का इतिश्री कर रही.जिसके कारण लोगों के बीच न तो जागरूकता फैल पाती है और न ही पीड़ित लोगों का फॉलोअप हो पाता है़
