मुंगेर: मुख्यमंत्री के कार्यक्रम को लेकर सुरक्षा की दृष्टिकोण से प्रशासनिक स्तर पर तैयारी पूरी कर ली गयी है. कार्यक्रम में कुल 350 पुलिस बल तैनात रहेंगे. कार्यक्रम स्थल पर कड़ी सुरक्षा के साथ-साथ मंच से 40 गज की दूरी तक डीमार्क बनाया गया है. कार्यक्रम स्थल पर लगभग 20 हजार लोगों की क्षमता का दीर्घा बनाया गया है. वही मुख्य मंच के चारों तरफ कड़ी सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम किया गया है.
निजी स्तर पर बनाये गये स्मारक : सरदार नित्यानंद सिंह सहित उसके पिता व भाई का स्मारक आज निजी स्तर पर बनाये गये हैं जिसका अनावरण शुक्रवार को राज्य के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी करेंगे. हाल यह है कि मुख्यमंत्री का यह कार्यक्रम भी निजी बनकर रह गया है और मुंगेर प्रशासन इस कार्यक्रम को निजी स्तर पर ही देख रहा है. प्रशासनिक स्तर पर भले ही सुरक्षा के दृष्टिकोण से इंतजाम किये गये हैं. लेकिन अन्य सभी खर्च सरदार नित्यानंद सिंह फाउंडेशन की ओर से ही किया जा रहा है.
निजी कार्यक्रम बन कर रह गया शहीद स्मारक का अनावरण :
शहीद के चीताओं पर हर वर्ष लगेंगे मेले, वतन पे मरने वालों का, बांकी यही निशा होगा ’’ आजादी के बाद यह फलसफा विस्मृत कर दिया गया. शहीदों के नाम पर स्मारक तो दूर स्मारक के लिए सरकार जमीन तक उपलब्ध नहीं करा सकी. यह बात किसी और की नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में आहुति देने वाले पंडित कमलेश्वरी प्रसाद सिंह और उनके दो पुत्रों की है. निजी स्तर पर इनके स्मारक बनाये गये हैं. जिसका अनावरण आज होना है. वतन की आन-शान की रक्षा के लिए पूरा परिवार समर्पित हो गया. इस परिवार के सरदार नित्यानंद सिंह ने तो शहादत की मिसाल कायम की. जिस पर न सिर्फ मुंगेर को बल्कि बिहार को भी नाज है.
सरदार नित्यानंद सिंह स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण कड़ी थे. जिन्होंने फौज की लांस नायक की नौकरी छोड़ आजादी की लड़ाई में कूद पड़े और नेपाल की तराई में आजाद दस्ते का गठन कर सेनानियों को हथियार का प्रशिक्षण देने का काम किया. उसके उपरांत नेपाल के ही हनुमाननगर जेल पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया सहित अन्य बंदियों को छुड़ाने में कामयाबी हासिल की. क्रांति की कड़ी को जारी रखने के क्रम में सियाराम दल में धन संचय, शस्त्र संचय, शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण और अंगरेजी हुकूमत के प्रतिरोध के लिए जनसंगठन का काम करते रहे. इसी कड़ी में सोनवर्षा थाने पर हमला किया और इस हमले में अंगरेजी हुकूमत के गोली के निशाना बनकर शहीद हो गये. यदि आजादी की लड़ाई पर लिखने वालों की बात करें तो केके दत्ता को छोड़ कर किसी इतिहासकार की नजर इन शहीदों पर नहीं पड़ी.
