विकास की दौड़ में पिछड़ता जा रहा तारापुर
तारापुर : शहीदों की धरती तारापुर राजनीतिक रूप से काफी समृद्ध रहा है. तारणी प्रसाद सिंह एवं शकुनी चौधरी जैसे दिग्गज इस क्षेत्र का लगातार प्रतिनिधित्व करते रहे जो राज्य मंत्री परिषद में वर्षों तक मंत्री पद को भी सुशोभित किये. शकुनी चौधरी के पुत्र सम्राट चौधरी भी राज्य मंत्रिमंडल के सदस्य रहे और मेवालाल चौधरी दंपती भी लगातार दो बार से तारापुर विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, लेकिन विकास के आइने में यह क्षेत्र पिछड़ता जा रहा है. अनुमंडल बनने के दो दशक तक तारापुर को नगर निकाय का दर्जा तक नहीं मिल पाया है. फलत: यहां नागरिक सुविधाओं का विस्तार भी नहीं हो रहा. त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के सर्वोच्च पद पर आज भी इस क्षेत्र का कब्जा है. लेकिन चाहे यहां का जिला परिषद स्टैंड हो या बाजार सभी जगह कुव्यवस्था-ही-कुव्यवस्था है.
विकास के दौर में है बदहाल स्थिति
तारापुर मुख्यालय को त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के तहत पंचायत का दर्जा प्राप्त है. इसके साथ ही इस प्रखंड में जिला परिषद के दो पद हैं. लेकिन जिला परिषद के स्तर से भी विकास की कोई रूपरेखा अबतक यहां नहीं उतर पायी है. चाहे वह तारापुर बस पड़ाव की स्थिति हो या फिर कांवरिया विश्रामालय की. तारापुर बस स्टैंड की बदहाल व्यवस्था है. गंदगी का ढेर, जीर्ण शीर्ण शौचालय जहां इसकी पहचान बन गयी है. वहीं हल्की सी भी बारिश होने पर बस पड़ाव में भारी कीचड़ हो जाती है.
बदहाली यह है कि यदि इस बस पड़ाव में जिला परिषद द्वारा एक मार्केट कांप्लैक्स बना दिया जाये तो न सिर्फ युवाओं को रोजगार मिलेगा, बल्कि जिला परिषद का आय भी बढ़ेगा. परिषद का डाक बंगला को तोड़ दिया गया है. बहरहाल विकास के दौर में तारापुर सिमटता चला जा रहा और न तो यहां का व्यावसायिक विकास हो रहा और न ही सामाजिक. भले ही राजनीतिक विकास की रोटी खूब सेंकी जाती है. समाजसेवी जितेंद्र कुमार सिंह कहते हैं कि यह ऐसा अनुमंडल मुख्यालय है जहां न तो एक सार्वजनिक शौचालय है और न ही मूत्रालय.
गंदगी व जाम शहर की पहचान
तारापुर बाजार की पहचान गंदगी व सड़क जाम बन गयी है. थाना चौक की स्थिति इस नगर की बदहाली को बयां करता है. उर्दू चौक से मोहनगंज बाजार तक की दशा शहरवासियों के लिए पीड़ादायक है. जहां सड़क के फुटपाथ पर दुकानें सजती है और जाम से आम लोग परेशान रहते हैं. स्टेट हाइवे पर ही सब्जी बेचने वालों से लेकर हर प्रकार की दुकानें लगती है. चाहे वह मछली, मांस या मुर्गा की हो. जबकि इन सामग्री को बेचने के लिए इन्हें कत्लखाने का लाइसेंस लेना चाहिए जो यहां के एक भी दुकानदार के पास नहीं है. मुख्य सड़क पर दुकान लगाने का विरोध तो हर कोई करता है, लेकिन मामला ढाक के तीन पात वाली हो जाती है. शहर में बार-बार प्रशासनिक स्तर पर अतिक्रमण हटाओ अभियान भी चला है. लेकिन उसका प्रभाव महज सप्ताह दस दिन ही रहता है.
अनुमंडल स्तरीय कई कार्यालय अब तक तारापुर में नहीं खुले
सुल्तानगंज-देवघर स्टेट हाइवे पर स्थित तारापुर की पहचान श्रावणी मेला को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर है. साथ ही यह शहीदों की धरती रही है. आजादी के बाद इस क्षेत्र का जितना विकास होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा. खड़गपुर से अलग होकर दो दशक पूर्व तारापुर को अनुमंडल का दर्जा दिया गया. ताकि इस क्षेत्र का समुचित विकास हो सके. इस अनुमंडल के अधीन तारापुर के अतिरिक्त असरगंज व संग्रामपुर प्रखंड हैं. जिसकी प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह तारापुर से संचालित होती है,
लेकिन यह अनुमंडल भी आज परिपूर्ण नहीं है. क्योंकि अनुमंडल स्तरीय कई कार्यालय अबतक यहां नहीं खुले. न तो अनुमंडलीय न्यायालय बन पाया है और न ही अनुमंडलीय कारा की व्यवस्था हुई है. अलबत्ता शायद यह राज्य का पहला अनुमंडल होगा जिसे नगर निकाय में शामिल नहीं किया गया.
