विश्व प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल की जन्मस्थली बदहाल, 14 साल बाद भी संग्रहालय का सपना अधूरा

जिस घर में जॉर्ज ऑरवेल ने जन्म लिया, वह आज उपेक्षा का शिकार है. 14 साल पहले घोषित संग्रहालय और संरक्षण योजनाएं अधूरी हैं. असामाजिक तत्वों का जमावड़ा और गंदगी ने ऐतिहासिक पहचान को धूमिल कर दिया है.

George Orwell Birthplace: जिस घर में दुनिया के सबसे प्रभावशाली लेखकों में गिने जाने वाले जॉर्ज ऑरवेल (एरिक आर्थर ब्लेयर) ने पहली बार आंखें खोली थीं, वह आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है. पूर्वी चंपारण के गोपाल साह विद्यालय छात्रावास परिसर में स्थित यह ऐतिहासिक बंगला प्रशासनिक उदासीनता, रखरखाव की कमी और स्थानीय विवादों के बीच बदहाली का प्रतीक बन चुका है.

25 जून 1903 को इसी औपनिवेशिक भवन में जॉर्ज ऑरवेल का जन्म हुआ था. उनके पिता ब्रिटिश सरकार के अफीम विभाग में कार्यरत थे और उस समय मोतिहारी में पदस्थापित थे. बाद में ऑरवेल ने 'एनिमल फार्म' और 'नाइंटीन एटी-फोर (1984)' जैसे विश्व प्रसिद्ध उपन्यास लिखे, जिन्होंने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई.

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धरोहर घोषित हुई, लेकिन संरक्षण अधूरा रह गया

बिहार सरकार ने वर्ष 2010 में इस भवन को संरक्षित धरोहर घोषित किया था. इसके दो वर्ष बाद 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यहां संग्रहालय, पुस्तकालय और सांस्कृतिक केंद्र विकसित करने की घोषणा की.

शुरुआती मरम्मत के बाद काम लगभग ठहर गया. आज भवन की दीवारें टूट-फूट का शिकार हैं और पूरा परिसर उपेक्षा की कहानी बयां कर रहा है.

अब परिसर में जुटते हैं असामाजिक तत्व

ऐतिहासिक भवन का मुख्य प्रवेश द्वार जर्जर हो चुका है. स्थानीय लोगों के अनुसार, परिसर में अक्सर आवारा पशु घूमते रहते हैं. शाम होते ही यहां असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लग जाता है. कई बार परिसर में जुआ और ताश खेलने जैसी गतिविधियां भी देखी जाती हैं.

जिस स्थान पर साहित्य प्रेमियों और शोधकर्ताओं की आवाजाही होनी चाहिए थी, वहां अब सुरक्षा और निगरानी का अभाव साफ दिखाई देता है.

गंदगी ने छिपा दी इतिहास की पहचान

परिसर के चारों ओर कूड़ा-कचरा और झाड़ियां फैली हुई हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल जॉर्ज ऑरवेल की जयंती या पुण्यतिथि के अवसर पर औपचारिक सफाई होती है. बाकी दिनों में यह धरोहर उपेक्षित रहती है.

2021 में तोड़ दी गई थी ऑरवेल की प्रतिमा

9 जनवरी 2021 को असामाजिक तत्वों ने परिसर में स्थापित जॉर्ज ऑरवेल की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया था. प्रतिमा को पास के सूखे कुएं में फेंक दिया गया था.

पुलिस ने प्रतिमा के हिस्से बरामद कर अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी. हालांकि, घटना के वर्षों बाद भी प्रतिमा को दोबारा उसके स्थान पर स्थापित नहीं किया जा सका है.

विकास की राह में वैचारिक विवाद

स्थानीय जानकारों का कहना है कि इस धरोहर के विकास को लेकर वैचारिक मतभेद भी सामने आते रहे हैं.

कुछ लोगों का तर्क है कि महात्मा गांधी के सत्याग्रह की कर्मभूमि रहे मोतिहारी में किसी ब्रिटिश लेखक की विरासत को प्रमुखता नहीं मिलनी चाहिए. वहीं दूसरी ओर इतिहासकारों और साहित्य प्रेमियों का मानना है कि जॉर्ज ऑरवेल विश्व साहित्य की साझा धरोहर हैं और उनकी जन्मस्थली का संरक्षण इतिहास और पर्यटन—दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है.

दुनिया में सम्मान, जन्मस्थली में उपेक्षा

ब्रिटेन सहित दुनिया के कई देशों में जॉर्ज ऑरवेल के साहित्यिक योगदान को लगातार सम्मान मिल रहा है. हाल के वर्षों में ब्रिटेन ने उनके सम्मान में विशेष स्मारक सिक्का भी जारी किया.

इसके उलट, उनकी जन्मस्थली आज बुनियादी रखरखाव के लिए भी संघर्ष कर रही है. देश-विदेश से आने वाले साहित्य प्रेमी और पर्यटक यहां की स्थिति देखकर निराश लौटते हैं.

पर्यटन की बड़ी संभावना, लेकिन इंतजार जारी

स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक परिसर को संग्रहालय, शोध केंद्र और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विकसित किया जाए, तो यह पूर्वी चंपारण के पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण वैश्विक आकर्षण बन सकता है.

फिलहाल यह विश्व प्रसिद्ध जन्मस्थली विकास योजनाओं के पूरा होने और समुचित संरक्षण का इंतजार कर रही है.

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Author: Intejarul haq

Published by: Aaruni Thakur

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