नेपाल बाढ़: 289 शव बरामद, मलबे में शवों की तलाश कर रहे खोजी कुत्ते

रसुवा में आई भीषण बाढ़ के बाद 289 शव बरामद किए जा चुके हैं. शवों के सुरक्षित प्रबंधन और पहचान की प्रक्रिया प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है. विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक तरीके से शवों को संरक्षित करने के सुझाव दिए हैं.

Nepal Flood: रक्सौल. रसुवा में आई भीषण बाढ़ के बाद शव मिलने का सिलसिला लगातार जारी है. अब तक 289 शव बरामद किए जा चुके हैं. बाढ़ के तेज बहाव के कारण शव अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुंच गए हैं, जिससे उनकी खोज और पहचान का काम चुनौतीपूर्ण हो गया है. वहीं पर्याप्त शवगृह और चिस्यान (कोल्ड स्टोरेज) की सुविधा नहीं होने से शवों के सुरक्षित प्रबंधन की समस्या भी बढ़ गयी है.

नेपाल में आयी भीषण बाढ़ के बाद का नजारा

289 शव बराद, सुरक्षित रखने की चुनौती

बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बड़ी संख्या में शव मिलने के बाद उनके सुरक्षित प्रबंधन को लेकर प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी हो गयी है. चितवन के स्वास्थ्य संस्थानों में करीब 50 शव रखने की क्षमता बतायी जा रही है, जबकि बरामद शवों की संख्या इससे कई गुना अधिक है.

बाढ़ में शव चितवन से लेकर नवलपरासी तक अलग-अलग क्षेत्रों में मिलने की जानकारी है. ऐसे में स्थानीय और प्रदेश सरकारों के बीच समन्वय कर अस्थायी शव भंडारण केंद्र बनाने की जरूरत बतायी जा रही है.

जल्दबाजी में अंतिम संस्कार से बचने की सलाह

फोरेंसिक विशेषज्ञों ने बड़ी प्राकृतिक आपदा के दौरान शव मिलने के बाद जल्दबाजी में अंतिम संस्कार नहीं करने की सलाह दी है. विशेषज्ञों के अनुसार शव की पहचान से जुड़े सभी साक्ष्यों को सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि बाद में किसी तरह की गलत पहचान की स्थिति उत्पन्न न हो.

त्रिवि शिक्षण अस्पताल के वरिष्ठ फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. गोपाल चौधरी के अनुसार प्रत्येक शव को अलग नंबर देकर टैग किया जाना चाहिए. शव मिलने की जगह, समय, कपड़े, गहने, विशेष पहचान चिह्न और तस्वीर सहित सभी जरूरी विवरण रिकॉर्ड किए जाने चाहिए.

अस्थायी शव भंडारण केंद्र बनाने का सुझाव

विशेषज्ञों ने बड़ी संख्या में शव मिलने की स्थिति में सुरक्षित स्थान पर वैज्ञानिक तरीके से शवों को संरक्षित करने का सुझाव दिया है. इसके लिए रेफ्रिजरेशन की सुविधा वाले बड़े कंटेनरों को अस्थायी शव भंडारण केंद्र के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

विशेषज्ञों के अनुसार एक बड़े कंटेनर में करीब 50 शव रखने की व्यवस्था की जा सकती है. इससे शवों को सुरक्षित रखने और पहचान की प्रक्रिया पूरी होने तक उनका उचित प्रबंधन करने में मदद मिल सकती है.

डीवीआई टीम गठित करने की जरूरत

फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. हरिहर वस्ती ने कहा कि इतनी बड़ी आपदा में शव प्रबंधन का काम किसी एक अस्पताल या चिकित्सक के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. इसके लिए डिजास्टर विक्टिम आइडेंटिफिकेशन (डीवीआई) टीम गठित की जानी चाहिए.

इस टीम में फोरेंसिक चिकित्सक, पुलिस, दंत चिकित्सक, फिंगरप्रिंट और डीएनए विशेषज्ञ समेत जरूरी कर्मचारियों को शामिल करने का सुझाव दिया गया है.

फिंगरप्रिंट और डीएनए से होगी पहचान

विशेषज्ञों के अनुसार जिन शवों की सामान्य तरीके से पहचान संभव है, उन्हें परिजनों की पहचान, कपड़े, गहने, टैटू और अन्य पहचान चिह्नों के आधार पर पहचाना जा सकता है.

वहीं जिन शवों की पहचान मुश्किल है, उनकी पहचान फिंगरप्रिंट, दांतों की जांच और जरूरत पड़ने पर डीएनए परीक्षण के जरिए की जा सकती है. विशेषज्ञों ने निश्चित पहचान के बाद ही शव परिजनों को सौंपने पर जोर दिया है.

गलत पहचान से बचना सबसे बड़ी प्राथमिकता

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जल्दबाजी में अंतिम संस्कार या बिना वैज्ञानिक पुष्टि के शव परिजनों को सौंपने से गलत पहचान का खतरा हो सकता है. इसलिए प्रत्येक शव से जुड़े सभी साक्ष्यों और रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना जरूरी है.

बाढ़ प्रभावित इलाकों में लगातार शव मिलने के बीच अब प्रशासन के सामने राहत-बचाव के साथ शवों की पहचान और सुरक्षित प्रबंधन की चुनौती भी अहम हो गयी है.

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लेखक के बारे में

By मनोज कुमार गुप्ता

मनोज कुमार गुप्ता बीते 15 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. वह प्रिंट, रेडियो और डिजिटल माध्यमों का व्यापक अनुभव रखते हैं. वर्तमान में भारत-नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र से रिपोर्टिंग करते हुए अंतरराष्ट्रीय संबंधों, सीमा सुरक्षा और नेपाल की खबरों पर पैनी नजर रखते हैं. सामाजिक सरोकारों में गहरी रुचि के साथ वे क्षेत्र की जनसमस्याओं को प्रमुखता से उठाने और उनके समाधान के प्रयासों के लिए जाने जाते हैं.

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