Madhubani Pearl Farming: मधुबनी जिले के किसानों के लिए मीठे पानी में मोती की खेती अतिरिक्त आमदनी और आत्मनिर्भरता का एक नया व मजबूत जरिया बनकर उभर रही है. खेती-किसानी में बढ़ती लागत और सीमित आय के दौर में अब किसानों को बड़ी जमीन या भारी पूंजी पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है. मत्स्य विभाग की नई योजना के तहत जिस तालाब में अब तक केवल पारंपरिक मछली पालन होता था, उसी तालाब में सीप पालकर किसान दोहरा मुनाफा कमा सकते हैं. महज आधा एकड़ जलक्षेत्र से शुरू होने वाला यह व्यवसाय छोटे और सीमांत किसानों के जीवन में आर्थिक समृद्धि लाने की पूरी क्षमता रखता है.
Fish Pearl Farming: 0.5 एकड़ तालाब में 2000 सीपियों से शुरू होगी यूनिट
मोती पालन शुरू करने के लिए उपयुक्त और स्वच्छ पानी वाले तालाब का चयन अनिवार्य है. किसान 0.5 एकड़ के तालाब में लगभग 2000 सीपियों की प्रारंभिक यूनिट स्थापित कर सकते हैं. इस सेटअप को तैयार करने के लिए बांस के खंभे, नायलॉन रस्सी, स्टील ट्रे, एरेटर, सर्जिकल किट और उच्च गुणवत्ता वाले सीप के बीजों की आवश्यकता होती है. विभागीय आकलन के अनुसार एक मानक यूनिट की स्थापना पर कुल 2,24,600 रुपये की अनुमानित लागत आती है, जिस पर सरकार अनुदान भी दे रही है.
सीपियों की देखभाल और गुणवत्ता नियंत्रण जरूरी
मोती पालन की पूरी प्रक्रिया में पानी की गुणवत्ता बनाए रखना और सीपियों की नियमित देखरेख सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. विभागीय आंकड़ों के मुताबिक अनुकूल परिस्थितियों में 2000 सीपियों में से औसतन 60 प्रतिशत यानी करीब 1200 सीपियां जीवित रहकर पूर्ण रूप से मोती का उत्पादन करती हैं. तैयार मोतियों को उनकी चमक, आकार और फिनिशिंग के आधार पर ए, बी और सी तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है.
ग्रेडिंग के आधार पर बाजार से 3.14 लाख रुपये की होगी सकल बिक्री
विभागीय अनुमान के मुताबिक उत्पादित मोतियों के बाजार मूल्य से किसानों को आकर्षक रिटर्न मिलता है. इसमें 120 ग्रेड-ए मोतियों से 1.20 लाख रुपये, 216 ग्रेड-बी मोतियों से 1.08 लाख रुपये और 864 ग्रेड-सी मोतियों से 86,400 रुपये प्राप्त होते हैं. इस तरह कुल सकल आय लगभग 3.14 लाख रुपये तक पहुंच जाती है. इसमें से परिचालन खर्च घटाने के बाद किसान को लगभग 1.82 लाख रुपये का शुद्ध लाभ होता है.
मछली के साथ मोती पालन से आमदनी होगी दोगुनी
इस योजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि किसान को अलग से किसी जमीन या नए तालाब की जरूरत नहीं होती. मछली पालन के साथ-साथ उसी जलक्षेत्र में सीपियों को जालीदार ट्रे में लटकाकर पाला जाता है. एक ही संसाधन से आय के दो रास्ते खुलने से किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी और वे धीरे-धीरे आत्मनिर्भर उद्यमी के रूप में स्थापित हो सकेंगे.
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