Madhubani News : श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए किया तर्पण व पिंडदान

श्राद्ध पक्ष का पहला तर्पण रविवार को किया गया. इसी के साथ अगले 14 दिनों तक नदी-तालाबों में पितरों को जल अर्पण-तर्पण करने का सिलसिला भी शुरू हो गया है.

मधुबनी.

श्राद्ध पक्ष का पहला तर्पण रविवार को किया गया. इसी के साथ अगले 14 दिनों तक नदी-तालाबों में पितरों को जल अर्पण-तर्पण करने का सिलसिला भी शुरू हो गया है. पितृ पक्ष के पहले दिन रविवार की सुबह श्रद्धालुओं ने नदी-तालाबों के किनारे जाकर स्नान-ध्यान किया. फिर पितरों के निमित्त पूजा कर उंगली में कुश धारण किया और पानी भरे तालाब में और कुछ लोग परात में जौ, कुश, तिल डालकर पितरों को जल अर्पित किया. पहले दिन अगस्त मुनि का और उन पितरों के लिए पूजा की गयी, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि पर हुई है. उन मृतकों को परिवारवालों ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए याद किया. इसके बाद मान्यता के अनुसार कौआ, कुत्ता, गाय और चींटियों के लिए भोजन निकाला गया और फिर पितरों को अर्पण-तर्पण करके ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दी गयी.

पितर खुश होंगे तो आएगी खुशहाली

पंडित सुरेश झा ने कहा कि देव कार्य से बढ़कर पितृ कार्य को श्रेष्ठ माना जाता है. देवी-देवता की पूजा न कर सकें तो कोई बात नहीं, लेकिन अपने पूर्वजों को हमेशा याद रखना चाहिए और उनकी शांति के लिए पूजा करनी चाहिए.

दक्षिण दिशा में पितरों को दिया जाता है जल

पितृपक्ष में पितरों का आगमन दक्षिण दिशा से होती है. शास्त्रों के अनुसार दक्षिण दिशा में चंद्रमा के उपरी कक्षा में पितृलोक स्थित है. इस दिशा को यम की दिशा भी माना गया है. इसलिये दक्षिण दिशा में पितरों का अनुष्ठान किया जाता है. रामायण में उल्लेख है कि जब दशरथ जी की मृत्यु हुई थी तो भगवान राम ने स्वप्न में उन्हें दक्षिण दिशा की ओर जाते हुये देखा था. रावण की मृत्यु से पहले त्रिजटा ने सवप्न में रावण को गधे पर बैठकर दक्षिण दिशा की ओर जाते देखा था. इन्हीं कारणों से पितरों को दक्षिण दिशा की ओर जल अर्पण करने का विधान है.

व्यक्ति के मृत्यु तिथि को करें श्राद्ध

पुराण के अनुसार व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि को हुई होती है. उसी तिथि में उनका श्राद्ध करना चाहिए. यदि जिनकी मृत्यु के दिन का सही पता न हो. उनका श्राद्ध अमावस्या तिथि को कराना चाहिए. श्राद्ध मृत्यु वाली तिथि को किया जाता है. मृतयु तिथि के दिन पितरों को अपने परिवार द्वारा दिये अन्न जल को ग्रहण करने की आज्ञा है. इसलिये उस दिन पितर कहीं भी किसी लोक में जिस रुप में होते हें. उसी अनुरुप आहार ग्रहण कर लेते हैं. विदित हो कि श्राद्ध पक्ष में तिल व कुश का विशेष महत्व है. गरुड़ पुराण के अनुसार तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु व महेश कुश के क्रमश: जड़, मध्य और अग्र भाग में रहते हैं. कुश का अग्र भाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्य का और जड़ भाग पितरों का माना गया है. वहीं तिल पितरों का प्रिय है और दुरात्माओं को दूर भगाने वाला माना गया है.

पितरों से मिलता है आशीर्वाद

भादव महीने की पूर्णिमा से शुरु हुई पितृपक्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को समाप्त होगी. इन पक्ष में विधि विधान से पितरों से संबंधित कार्य करने से पितरों का आशीर्वाद भी मिलता है. माना जाता है कि इससे पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. पितृपक्ष को श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जाना जाता है.

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Author: GAJENDRA KUMAR

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