ताम्रपत्र से हुआ था सम्मान, 5 साल जेल भी नहीं तोड़ सकी हिम्मत, कौन थे राजेश्वर प्रसाद सिंह?

राजेश्वर प्रसाद सिंह, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में 5 साल जेल की सजा काटी, उनकी 37वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया गया. उन्होंने जेल से रिहा होने के बाद शिक्षा को अपना मिशन बनाया और समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया.

Rajeshwar Prasad Singh Death Anniversary: मधेपुरा. आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने वाले स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद स्व. राजेश्वर प्रसाद सिंह की 37वीं पुण्यतिथि उनके पैतृक गांव तरुणेश्वरपुर झिटकिया में श्रद्धापूर्वक मनाई गई. ग्वालपाड़ा प्रखंड स्थित गांव में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में बड़ी संख्या में ग्रामीण और गणमान्य लोग जुटे और उनके तैलचित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें याद किया.

राजेश्वर प्रसाद सिंह की कहानी सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन में संघर्ष तक सीमित नहीं है. उन्होंने आजादी की लड़ाई में जेल की सजा झेली और बाद में शिक्षा के क्षेत्र को अपना जीवन समर्पित कर दिया. उनके परिवार और गांव के लोगों के लिए उनका जीवन आज भी संघर्ष, त्याग और समाज के प्रति जिम्मेदारी की मिसाल है.

अंग्रेजों ने 5 साल जेल में रखा, नहीं कम हुआ आजादी का जुनून

श्रद्धांजलि सभा में उनके पुत्र और समाजसेवी योगेंद्र नारायण सिंह ने कहा कि राजेश्वर बाबू बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. आजादी के आंदोलन में उनका योगदान अतुलनीय रहा.

अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें पांच वर्षों तक जेल में रखा. लंबी जेल यात्रा और कठिन परिस्थितियां भी उनके हौसले को नहीं तोड़ सकीं. धमदाहा अगस्त क्रांति के प्रणेता के रूप में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है.

उनका संघर्ष उस दौर की याद दिलाता है, जब देश की आजादी के लिए हजारों लोगों ने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं और अपने भविष्य की परवाह किए बिना आंदोलन का रास्ता चुना था.

आजादी के 25वें साल में इंदिरा गांधी ने किया था सम्मानित

स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को देश ने भी सम्मान दिया. वर्ष 1972 में आजादी के 25वें वर्ष के अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राजेश्वर प्रसाद सिंह को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था.

परिवार के लोगों और ग्रामीणों के लिए यह सम्मान उनके संघर्ष की राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान का प्रतीक रहा. 37वीं पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में उनके स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े योगदान को विशेष रूप से याद किया गया.

जेल से निकलने के बाद शिक्षा को बनाया जीवन का मिशन

राजेश्वर प्रसाद सिंह ने स्वतंत्रता आंदोलन के बाद भी समाज के लिए काम करना जारी रखा. उन्होंने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम माना.

शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, मधेपुरा के प्राचार्य के रूप में उन्होंने उत्कृष्ट शिक्षकों की पौध तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनके प्रयासों से शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले कई लोगों को दिशा मिली और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का अवसर मिला.

बाद में उन्होंने अपने पैतृक गांव में जमीन दान कर विद्यालय बनवाया. जीवन के अंतिम दौर तक वे शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने के अभियान से जुड़े रहे.

गांव की मिट्टी से जुड़ा रहा स्वतंत्रता सेनानी का रिश्ता

तरुणेश्वरपुर झिटकिया में आयोजित पुण्यतिथि कार्यक्रम का मानवीय पक्ष भी खास रहा. जिस गांव में उनका जन्म हुआ, उसी गांव में उन्होंने शिक्षा के लिए जमीन दान की और लोगों के बीच जागरूकता फैलाने का काम किया.

यही वजह है कि स्थानीय लोगों के बीच उनकी पहचान केवल स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में भी बनी, जिन्होंने अपने गांव और समाज के लिए अपने संसाधनों का इस्तेमाल किया.

37वीं पुण्यतिथि पर ग्रामीणों की मौजूदगी ने यह भी दिखाया कि स्थानीय स्तर पर उनके योगदान की स्मृति आज भी कायम है. स्वतंत्रता आंदोलन की उनकी कहानी नई पीढ़ी के लिए संघर्ष और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश देती है.

Rajeshwar Prasad Singh Death Anniversary: श्रद्धांजलि सभा में बड़ी संख्या में लोग हुए शामिल

कार्यक्रम में ब्रजेंद्र नारायण सिंह, पूर्व उपमुखिया सुधेन्द्र नारायण सिंह, सोनू सिंह, किशन मोहन, कर्मचारी महासंघ के महामंत्री शरद कुमार, सेवानिवृत्त क्षेत्रीय प्रबंधक उमेश प्रसाद सिंह, दिलीप कुमार, जीविका प्रबंधक रविशेखर सिंह, सरस्वती देवी, रीता देवी, रुद्रप्रताप सिंह और शांतनु सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे.

लोगों ने राजेश्वर प्रसाद सिंह के तैलचित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी. कार्यक्रम के दौरान उनके स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा के क्षेत्र में योगदान और समाज के प्रति समर्पण को याद किया गया.

राजेश्वर प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि का आयोजन हर साल उनके योगदान को याद करने का अवसर बनता है. उनकी जिंदगी यह बताती है कि देश की आजादी के लिए किया गया संघर्ष केवल उस दौर तक सीमित नहीं रहता. उसके विचार और समाज के लिए किए गए काम आने वाली पीढ़ियों को भी प्रभावित करते हैं.

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लेखक के बारे में

By कुमार आशीष

कुमार आशीष 15 वर्षों से प्रभात खबर समूह के साथ पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से जनसंचार में डिग्री प्राप्त करने के बाद इन्होंने राजनीति, अपराध और कोसी अंचल की रिपोर्टिंग में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पिछले पांच वर्षों से सक्रिय हैं. पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए इन्हें नेपाल में 'अंतरराष्ट्रीय मैथिली युवा पत्रकारिता सम्मान' से नवाजा जा चुका है.

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