कागजों में दौड़ रही नल-जल योजना, जमीनी हकीकत बदहाल
उदाकिशुनगंज (मधेपुरा) से कौनैन बशीर की रिपोर्ट
मधेपुरा: मुख्यमंत्री सात निश्चय योजना के तहत हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने का सपना उदाकिशुनगंज प्रखंड क्षेत्र में अधूरा साबित होता नजर आ रहा है। करोड़ों रुपये खर्च कर शुरू की गई हर घर नल का जल योजना अब कई गांवों में पूरी तरह दम तोड़ चुकी है। कहीं टोटियां टूटकर इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं तो कहीं पाइपलाइन और मोटर सिर्फ शोभा की वस्तु बनकर रह गई है।
स्थिति यह है कि आज भी बड़ी आबादी आयरन, फ्लोराइड और आर्सेनिक युक्त पानी पीने को मजबूर है। प्रखंड क्षेत्र के कई पंचायतों में नल-जल योजना या तो अधूरी पड़ी है या निर्माण के कुछ ही दिनों बाद से बंद हो गई। कई जगहों पर जलमीनार और पाइपलाइन लगाए जाने के बावजूद लोगों के घरों तक पानी नहीं पहुंच रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित विभाग की लापरवाही और ठेकेदारों की मनमानी के कारण योजना पूरी तरह विफल हो रही है।
उदाकिशुनगंज समेत मधेपुरा जिले का भूगर्भीय जल पहले से ही आयरनयुक्त माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार जिले के कई इलाकों में पानी में आयरन की मात्रा सामान्य मानक से कई गुना अधिक है। इसके बावजूद शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में प्रभावी पहल नहीं होने से लोग धीमा जहर पीने को विवश हैं। ग्रामीण बताते हैं कि आयरनयुक्त पानी के सेवन से लोग त्वचा रोग, पेट की बीमारी, कब्ज, रक्तचाप और अन्य गंभीर रोगों से ग्रसित हो रहे हैं।
गांव-गांव वाहन से पानी बेच रहे कारोबारी
उदाकिशुनगंज प्रखंड क्षेत्र में शुद्ध पेयजल का संकट अब निजी पानी कारोबारियों के लिए कमाई का बड़ा जरिया बनता जा रहा है। गांवों में नल-जल योजना के ठप रहने और भूगर्भ जल में आयरन की अधिकता के कारण लोग बाजार से पानी खरीदने को मजबूर हैं। इसका फायदा उठाकर पानी बेचने वाले कारोबारी वाहन के जरिए गांव-गांव पहुंचकर पानी की सप्लाई कर रहे हैं।
इन दिनों सुबह होते ही प्रखंड क्षेत्र के कई गांवों में छोटे वाहन, टेंपो और पानी लदे गाड़ियों की आवाजाही शुरू हो जाती है। कारोबारी जार, गैलन और ड्रम के माध्यम से लोगों के घरों तक पानी पहुंचा रहे हैं। पीने योग्य पानी के लिए लोग निर्धारित कीमत चुकाने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र के अधिकांश चापाकलों से निकलने वाला पानी आयरनयुक्त है। पानी का रंग, स्वाद और गंध सामान्य नहीं रहने के कारण लोग इसका उपयोग पीने में नहीं करना चाहते। नतीजतन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को भी रोजाना पानी खरीदना पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों ने कहा कि सरकार की हर घर नल का जल योजना यदि सही तरीके से संचालित होती तो लोगों को पानी खरीदने की नौबत नहीं आती। कई पंचायतों में योजना बंद पड़ी है, जबकि कुछ जगहों पर पाइपलाइन और मोटर खराब रहने से जलापूर्ति ठप है।
पानी बेचने वाले कारोबारियों की मानें तो शुद्ध पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। पहले शहरों तक सीमित यह कारोबार अब गांवों में भी तेजी से फैल रहा है। गर्मी बढ़ने के साथ पानी की बिक्री में भी इजाफा हुआ है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से खराब पड़ी नल-जल योजनाओं को चालू कराने और शुद्ध पेयजल की स्थायी व्यवस्था करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि पानी जैसी मूलभूत जरूरत के लिए रोजाना पैसे खर्च करना आम परिवारों के लिए मुश्किल होता जा रहा है।
चापाकल और कुआं ही बना सहारा
प्रखंड क्षेत्र में आज भी अधिकांश लोग पेयजल के लिए चापाकल और कुओं पर निर्भर हैं। भूमिगत जलस्तर गहराने के कारण पानी में घुले लौह तत्व की मात्रा लगातार बढ़ रही है।
बताया जाता है कि वर्षों पहले अमृत पेयजल योजना भी शुरू की गई थी, लेकिन वह भी धरातल पर सफल नहीं हो सकी। विशेषज्ञों के अनुसार मधेपुरा जिले के कई इलाकों में 20 से 25 फीट की गहराई पर ही पानी निकलने लगता है। सतही जल में आयरन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन उसमें बैक्टीरिया अधिक होने से वह भी स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता। वहीं अधिक गहराई तक बोरिंग करने पर आयरन की मात्रा और बढ़ जाती है।
स्वाद और रंग से पहचाना जाता है आयरनयुक्त पानी
ग्रामीणों के अनुसार आयरनयुक्त पानी का स्वाद सामान्य पानी से अलग होता है। इससे बनी चाय का रंग काला पड़ जाता है और चावल भी भूरा दिखाई देता है। इस पानी से कपड़े धोने पर कपड़े पीले या मटमैले हो जाते हैं। बाल्टी, जग और अन्य बर्तन भी पीले पड़ने लगते हैं। लंबे समय तक इस पानी के उपयोग से लोगों के दांतों पर भी कालेपन का असर दिखने लगता है।
गंभीर बीमारियों का बढ़ रहा खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार आर्सेनिक और फ्लोराइड युक्त पानी के लगातार सेवन से त्वचा रोग, कैंसर, कमजोरी, कब्ज, अतिसार, उच्च रक्तचाप और समय से पहले बुढ़ापा जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
मानकों के अनुसार पेयजल में फ्लोराइड की अधिकतम मात्रा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर तथा आर्सेनिक की मात्रा 0.05 मिलीग्राम प्रति लीटर निर्धारित है, जबकि कई इलाकों में यह मात्रा इससे अधिक पाई जा रही है। इसी प्रकार आयरन की निर्धारित मात्रा 0.3 मिलीग्राम प्रति लीटर मानी जाती है, लेकिन यहां इसके भी अधिक होने की बात कही जा रही है।
ग्रामीण क्षेत्र में घरेलू जुगाड़ से पानी साफ करते लोग
क्या कहते हैं चिकित्सक
प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. रुपेश कुमार ने बताया कि अत्यधिक आयरनयुक्त पानी के सेवन से शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि सीमित मात्रा में आयरन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है, लेकिन इसकी अधिकता पाचन तंत्र को प्रभावित करती है।
उन्होंने बताया कि शरीर द्वारा अवशोषित आयरन का बड़ा हिस्सा खून बनाने में सहायक होता है, लेकिन अत्यधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।
