मधेपुरा जिले के कुमारखंड प्रखंड क्षेत्र में सरकार की महत्वाकांक्षी विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने वाले संवेदक (ठेकेदार) गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं. लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) और ग्रामीण कार्य विभाग (RWD) के तहत टेंडर के माध्यम से कराए गए निर्माण कार्यों की राशि पिछले करीब दस माह से लंबित है. अपनी निजी पूंजी और बैंक से ऋण लेकर काम पूरा कराने वाले ठेकेदारों को अब तक भुगतान नहीं मिलने से विकास कार्यों की रफ्तार थमने लगी है. विभागीय उदासीनता के कारण न सिर्फ ठेकेदारों की आर्थिक स्थिति चरमरा गई है, बल्कि मजदूरों और सामग्री आपूर्तिकर्ताओं (सप्लायर्स) का बकाया भी नहीं चुकाया जा पा रहा है.
जमा पूंजी फंसी, बैंक ब्याज और कर्ज के बोझ तले दबे संवेदक
ठेकेदारों ने अपनी व्यथा साझा करते हुए विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
- निजी पूंजी लगाकर पूरा कराया काम: संवेदकों ने सरकारी टेंडर के आधार पर सड़क, नाली, पुल-पुलिया और पेयजल से जुड़ी योजनाओं को पूरा करने के लिए अपनी पूरी पूंजी झोंक दी.
- 10 महीने से इंतजार: कार्य पूरा होने या प्रगति पर होने के बावजूद पिछले 10 महीनों से विभाग द्वारा एक रुपये का भुगतान नहीं किया गया है.
- आर्थिक तंगी व कर्ज: बैंक लोन की ईएमआई (EMI) और बाजार का बढ़ता कर्ज संवेदकों के लिए मानसिक व आर्थिक तनाव का कारण बन गया है.
मजदूरों का पलायन और सप्लायरों का बढ़ता दबाव
भुगतान रुकने का सीधा असर धरातल पर चल रहे निर्माण कार्यों और कामगारों पर पड़ रहा है:
- मजदूरी न मिलने से पलायन: लंबे समय से मजदूरी का भुगतान न होने के कारण मजदूर काम छोड़कर दूसरे राज्यों व शहरों में रोजगार की तलाश में पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं.
- मटेरियल सप्लायरों का तकादा: सीमेंट, बालू, गिट्टी और ईंट सप्लायरों का भारी बकाया होने के कारण उन्होंने आगे सामग्री की आपूर्ति करने से हाथ खड़े कर दिए हैं.
- ठप पड़ रहे विकास कार्य: निर्माण सामग्री और मजदूरों की कमी के कारण प्रखंड में कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा योजनाएं अधर में लटक गई हैं.
"काम का दबाव, लेकिन पैसे पर चुप्पी": विभागीय रवैये पर आक्रोश
संवेदकों का आरोप है कि विभाग के अधिकारी कार्य को समय पर पूरा कराने के लिए लगातार दबाव बनाते हैं, लेकिन जब भुगतान की बात आती है, तो स्पष्ट जानकारी देने से कतराते हैं:
- पारदर्शिता का अभाव: बिल जमा करने के महीनों बाद भी प्रक्रिया किस स्तर पर लंबित है, इसकी कोई ठोस सूचना संवेदकों को नहीं दी जा रही है.
- सरकार से अविलंब हस्तक्षेप की मांग: पीड़ित संवेदकों ने बिहार सरकार और संबंधित विभागों के वरीय अधिकारियों से गुहार लगाई है कि 10 माह से लंबित विपत्रों (Bills) की जांच कर राशि अविलंब निर्गत की जाए, ताकि विकास कार्यों को फिर से गति मिल सके और स्थानीय मजदूरों को उनकी मेहनत की कमाई मिल सके.
