अस्पताल व नोटबंदी के बीच पेंडुलम की तरह झूलता रहा बसंत, आखिरकार हो गयी मौत
मधेपुरा : देश की राजधानी दिल्ली की आवो हवा इतनी विषैली हो गयी है कि वहां मजदूरी करने वालों को मजदूरी के बदले बीमारी मिल रही है. यह वाक्या बंसत की है. जो बसंत ने अपनी मां को बताया. बसंत की मां एवं परिजनों ने कहा बसंत दिल्ली में रह कर मजदूरी का काम करता था़ लेकिन बड़े नोट बंद होने के बाद वहां मजदूरी मिलनी बंद हो गयी़ उसके अलावा उसे 06 दिन पूर्व बुखार आया़ किसी तरह उसने खून की जांच करायी रिपोर्ट में प्लेटलेट कम आने के बाद अस्पताल में भर्ती होने कहा गया़
लेकिन पास में पैसे नहीं होने के कारण बसंत किसी तरह गांव के लिए रवाना हुआ़ बेहद गंभीर स्थिति में शनिवार को मधेपुरा स्टेशन पर बसंत मिला़ वहां से उसे गांव लाया गया़ किसी को भी अंदेशा नहीं था उसे डेंगू और पीलिया है़ लेकिन रात में बसंत ने होश आने पर अपनी बीमारी की जानकारी दी़ रिपोर्ट भी दिया और फिर बेहोश हो गया़ वहां से सुबह सिंहेश्वर लाकर, पानी चढ़ाया गया लेकिन उसके बाद उसकी हालत और भी बिगड़ गयी है़ दोपहर में सदर अस्पताल मधेपुरा में बसंत को भर्ती किया गया.
गम्हरिया प्रतिनिधि के अनुसार काम के प्रति समर्पित बसंत को पूरा गांव दिलो जान से चाहता था. महज 19 वर्ष की उम्र में उसके इस तरह मर जाने से पूरा गांव आहत है. गुरुवार की दोपहर जैसे ही बसंत का शव गांव पहुंचा तो कोहराम मच गया. उसकी मां गीता देवी पछाड़े खा कर बार बार बेहोश हो रही थी. वहीं बड़ा भाई सदीप कुमार, सीत कुमार कह रहे थे अगर अपनी किडनी बेचने से भी कोई रुपये दे देता तो बसंत बच सकता था. तीन भाई तथा एक बहन में बसंत सबकी आंखों का दुलारा था.
पिता नारायण पोद्दार बस फटी – फटी आखों से देख रहे थे. वहीं बहन किरण देवी, बहनोई हरिशंकर पोद्दार, बड़ी भाभी कौशल देवी, छोटी भाभी खुशबू देवी का रो-रोकर बुरा हाल था. पूरा परिवार बस यही कह रहा था कि नोट बंदी की मार बसंत पर पड़ी. पहले तो रोजगार खत्म हुआ और फिर बीमारी लेकर घर आया. इलाज तक न हो सका.
