लखीसराय में 7वीं सदी से आस्था का केंद्र बना बड़हिया का मां काली मंदिर, यहां हर मनोकामना होती है पूरी

Aaj Ka Darshan: बिहार के लखीसराय जिले में स्थित बड़हिया का अतिप्राचीन मां काली मंदिर आज भी लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मां के दरबार में पहुंचने वाले भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटते.

Aaj Ka Darshan: लखीसराय में बड़हिया स्थित मां काली मंदिर की महिमा दूर-दूर तक प्रसिद्ध है. एनएच-80 किनारे स्थित यह प्राचीन मंदिर हर दिन हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है. खासकर मंगलवार और शनिवार को यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. लोगों का विश्वास है कि मां काली के इस दरबार में मांगी गयी हर मनोकामना पूरी होती है. यही कारण है कि वर्षों पुराना यह मंदिर आज भी लोगों की आस्था और विश्वास का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है.

मंगलवार और शनिवार को उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब

सामान्य दिनों में भी मंदिर परिसर भक्तों से भरा रहता है, लेकिन मंगलवार और शनिवार को यहां का दृश्य बेहद खास होता है. सुबह से ही पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं. मंदिर परिसर जय मां काली के जयकारों से गूंज उठता है.

कार्तिक माह में लक्ष्मी पूजा और काली पूजा के दौरान यहां भव्य आयोजन होता है. अमावस्या की रात से ही श्रद्धालु मां की आराधना में जुट जाते हैं. दूर-दराज से आने वाले महिला और पुरुष श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ मां के चरणों में माथा टेकते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.

पालवंश काल से जुड़ी है मंदिर की कहानी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर की स्थापना 7वीं सदी में पालवंश काल के दौरान हुई थी. कहा जाता है कि बड़हिया के संस्थापक जयजय ठाकुर और पृथु ठाकुर शक्ति उपासक थे. उन्होंने मां काली की आराधना के लिए इस मंदिर की स्थापना की थी.

तभी से बड़हिया के लोग मां काली को ग्रामदेवी के रूप में पूजते आ रहे हैं. यहां किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले मां काली की पूजा करना परंपरा मानी जाती है.

भव्य मंदिर और धर्मशाला श्रद्धालुओं को खींचती है अपनी ओर

ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर का भव्य स्वरूप तैयार किया गया है. श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए यहां धर्मशाला का निर्माण भी कराया गया है, जहां दूर-दराज से आने वाले भक्तों के ठहरने की व्यवस्था है.

मंदिर परिसर का शांत वातावरण, मां काली की मनमोहक प्रतिमा और धार्मिक ऊर्जा श्रद्धालुओं को बार-बार यहां आने के लिए प्रेरित करती है.

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लेखक के बारे में

Published by: Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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