सैलानियों की बाट जोह रही है सिमुलतला की हसीन वादियां
सिमुलतला : बिहार की मिनी शिमला के नाम से चर्चित सिमुलतला की हसीन वादियां एक बार फिर सैलानियों का बाट जोह रही है. चहुं ओर ऊंचे पहाड़ व हरे वृक्षों से सजा हुआ प्राकृतिक सौंदर्यता से परिपूर्ण इस छटा को देखकर ऐसा महसूस होता है कि मानो यहां की वादिया अपनी बाहें फैलाकर बेसब्री से […]
सिमुलतला : बिहार की मिनी शिमला के नाम से चर्चित सिमुलतला की हसीन वादियां एक बार फिर सैलानियों का बाट जोह रही है. चहुं ओर ऊंचे पहाड़ व हरे वृक्षों से सजा हुआ प्राकृतिक सौंदर्यता से परिपूर्ण इस छटा को देखकर ऐसा महसूस होता है कि मानो यहां की वादिया अपनी बाहें फैलाकर बेसब्री से सैलानियोंं को अपनी गोद में भर लेने का इंतजार कर रही हो. दरअसल प्रत्येक वर्ष ठंढ के दस्तक देते ही यहां सैलानियोंं का आना प्रारंभ हो जाता है. इस क्षेत्र की रौनक भी काफी बढ़ जाती है.
यहां के लोगों की आमदनी में भी काफी इजाफा रहता है. चाहे वो वाहन चालक, किराना दुकानदार, डेकोरेशन दुकानदार हो या फिर फल, सब्जी व दूध-दही के बिक्रेता. इस मौसम में सबों को सिमुलतला रूपी इस हरे भरे बगीचों में फूल खिलने का इंतजार यानी सैलानियोंं को यहां आने का इंतजार रहता है. हलांकि छिटपुट सैलानी वर्तमान में यहां देखे भी जा रहे हैं. जिसमे कुछ अपने निजी बंगले में व कुछ अन्य रिसोर्ट नामक होटल में रहकर यहां की स्वच्छ जलवायु का आनंद ले रहे हैं. लेकिन अपेक्षाकृत सैलानी अबतक यहां नही पहुचे हैं. जिसका सबो को इंतजार है.
आज भी लोग यह आस लगाये सैलानियोंं का स्वागत कर रहे हैं कि आखिर कभी तो सरकार की आंखे खुलेगी. कभी तो इस स्थान को पर्यटक स्थल का दर्जा मिलेगा व सिमुलतला का खोया हुआ अतीत वापस आयेगा.
सिमुलतला का एेतिहासिक धरोहर नॉल डेंगा हाउस.
असामाजिक तत्वों की सक्रियता से यहां कम आने लगे सैलानी
बताते चलें कि सिमुलतला की यह मनोरम दृश्य सरकारी उपलब्धियों का फल नहीं बल्कि प्रकृति का दिया हुआ एक स्वर्णिम उपहार है. जिसका अतीत इससे कई गुना अधिक खूबसूरत था. वर्तमान में भी यहां स्थित सैलानियों के लगभग साढ़े चार सौ बंगले उस अतीत का साक्ष्य है. लेकिन बदलते शासन व्यवस्था व सरकारी उपेक्षाओं का दंश झेलते झेलते इस पावन भूमि के श्वेत दामन पर बदनामी का छींटा पड़ गया व सैलानियों का यहां आना बंद हो गया. इस क्षेत्र के कुछ वृद्ध व जानकार लोगों के अनुसार आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व प्रकृति की इस अनमोल धरोहर पर पश्चिम बंगाल सहित राज्य के अन्य प्रान्तों से आए सैलानियोंं का सैलाब उमड़ पड़ता था. विभिन्न व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर हिंदी भाषा कम बंगला भाषा का इस्तेमाल अधिक होता था.
सैलानी यहां देर रात्रि तक बेख़ौफ घूमते थे व यह छोटा सा कस्बा बड़े बड़े शहरो में खूब चर्चित रहता था. सैलानियोंं के जुबान से सिमुलतला का गुणगान कभी कम नही होता था. लेकिन सरकार की लचर प्रशासनिक व्यवस्था का नाजायज फायदा यहां पनपे कुछ असामाजिक तत्वों को मिल गया व इनलोगों ने सैलानियों पर अपना कहर बरपाना शुरू किया. सैलानियों के कोठियों में घुसकर लूटपाट, खून खराबा करना व महिलाओं की अस्मत लूटना इन लोगों की नियति बन गयी थी. इन सब कारनामों से खौफ खाकर धीरे धीरे सैलानियोंं का यहां आना बंद हो गया. बड़े बड़े आलिशान बंगले कौड़ियों के भाव बिक गये. हालांकि विगत लगभग 10 वर्षों से शक्त हुई प्रशासनिक व्यवस्था के सन्देश से एक बार पुनः सैलानी सिमुलतला की व रुख कर रहे हैं. लेकिन अब अधिकतर लोगों का अपना बंगला नहीं होने के कारण उन्हें होटलों आदि में रहना पड़ता है. लिहाजा वो अधिक समय यहां नही बिता पाते हैं. बावजूद भी यहां के लोग सैलानी आगमन के प्रति काफी लालायित है.