ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट
Thakurganj Railway Station: किशनगंज जिले के ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन पर शनिवार को उमड़ी कामगारों और मुसाफिरों की भारी भीड़ ने सीमांचल के उस पुराने और गहरे जख्म को एक बार फिर हरा कर दिया, जिसे ‘पलायन का दर्द’ कहा जाता है. बकरीद का त्योहार खत्म होते ही क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों से हजारों युवाओं के कदम अपने पैतृक घरों की चौखट को छोड़ परदेस की ओर बढ़ने लगे हैं. शनिवार सुबह से ही ठाकुरगंज स्टेशन परिसर और प्लेटफॉर्म संख्या-1 पर यात्रियों का ऐसा हुजूम उमड़ा कि तिल रखने की भी जगह नहीं बची. अपनों को विदा करने आए परिजनों की नम आंखें, बच्चों को गोद में संभाले महिलाएं और भारी-भरकम बैग उठाए भागते युवा—यह पूरा दृश्य स्टेशन पर मौजूद हर शख्स की छाती को झकझोर रहा था.
पंजाब के लिए ‘अमृत भारत’ और दिल्ली के लिए ‘महानंदा’ बनीं मुख्य सहारा
- स्टेशन पर उमड़ा सिरों का सैलाब: शनिवार को जैसे ही ट्रेनों के आगमन की घोषणा (एनाउंसमेंट) हुई, प्लेटफॉर्म पर अफरा-तफरी का माहौल कायम हो गया. जनरल बोगियों में पैर रखने तक की जगह नहीं थी, जिसके कारण कामगार खिड़कियों और आपातकालीन द्वारों के सहारे कोच के भीतर घुसने की जद्दोजहद करते दिखे.
- पंजाब के मजदूरों के लिए जीवनरेखा: ठाकुरगंज और आस-पास के इलाकों से पंजाब (लुधियाना, जालंधर, अमृतसर) जाने वाले खेतिहर मजदूरों और फैक्ट्री कामगारों के लिए अमृतसर-अगरतला अमृत भारत एक्सप्रेस सबसे बड़ी और एकमात्र सीधी जीवनरेखा ट्रेन मानी जाती है. इस वजह से शनिवार को इस गाड़ी में क्षमता से चार गुना अधिक भीड़ दर्ज की गई.
- देश की राजधानी के लिए एकमात्र सहारा: वहीं, दिल्ली-एनसीआर के औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए सिक्किम महानंदा एक्सप्रेस मुख्य सहारा बनती दिखी, जिसमें भी पैर रखने की जगह नहीं थी.
“ख्याल रखना और समय पर लौटना…” भावुक दृश्यों से पसीजा दिल
विदाई की उदासी: स्टेशन का हर कोना शनिवार को किसी न किसी भावुक कहानी का गवाह बन रहा था. प्लेटफॉर्म पर खड़े एक बुजुर्ग अपने जवान बेटे के सिर पर हाथ रखकर बार-बार हिदायत दे रहे थे कि “परदेस में अपना ख्याल रखना और काम खत्म होते ही समय पर घर लौटना.” वहीं, गोद में छोटे बच्चे को लिए विलाप कर रही एक नवविवाहिता की आंखें अपने पति को अगले कई महीनों के लिए दूर जाते देख छलक रही थीं. इन दृश्यों के पीछे परदेस जाने की खुशी नहीं, बल्कि कर्ज चुकाने और बूढ़े माता-पिता की दवाइयों का खर्च उठाने का कड़ा संकल्प साफ झलक रहा था.
उद्योग-धंधों का अभाव और खेती की बढ़ती लागत है पलायन की मुख्य वजह
अर्थशास्त्रियों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि किशनगंज और पूरे सीमांचल क्षेत्र (पूर्णिया, कटिहार, अररिया) में आजादी के दशकों बाद भी कोई बड़ा उद्योग-धंधा, जूट मिल या भारी रोजगार के अवसर स्थापित नहीं हो सके.
इलाके में बाढ़ की विभीषिका, खेती की बढ़ती लागत, सीमित पारिश्रमिक और स्थानीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी दर का बेहद कम होना युवाओं को अन्य विकसित राज्यों की ओर जाने के लिए विवश करता है. शनिवार को ठाकुरगंज स्टेशन पर दिखा यह नजारा केवल मुसाफिरों की भीड़ नहीं, बल्कि सीमांचल की आर्थिक विवशता का एक जीवंत और कड़वा दस्तावेज था. ट्रेनें तो अपनी रफ्तार से परदेस की ओर रवाना हो गईं, लेकिन पीछे छोड़ गईं गांवों में बुजुर्गों का अकेलापन और सूने खलिहान.
